गुड मॉर्निंग एक्सक्लुसिव – सौरभ शाह
(शनिवार – १३ अक्टूबर २०१८)
किसी को आपके लिए प्रेम है या नहीं, लगाव है या नहीं इसका पता कैसे चलेगा? क्या प्रेम या लगाव को नापा तौला जा सकता है? कई बार हमें ऐसा क्यों लगता है कि हमारे प्रति किसी के प्रेम में कमी या बढोतरी हो रही है? क्या सचमुच ऐसी कमी बढोतरी होती है? या फिर हमारे अंदर आने वाले मूड के ज्वार भाटे के परिणामस्वरूप हमें ऐसा लगता है? सच्चा प्यार किसे कहते हैं? बनावटी प्यार किसे कहते हैं?
कई लोगों की जिंदगी में ऐसे अनेक प्रश्न आते रहते हैं. मित्र के लिए या पत्नी के लिए या फिर माता-पिता के लिए या फिर संतान के लिए, जो भी हमारे करीब होता है उसके लिए हमें यह प्रश्न सताता रहता है: क्या वह सचमुच मुझसे प्रेम करता है?
इन सभी सवालों का सरल निराकरण आचार्य विजय रत्नसुंदरसूरि महाराज साहेब से मिलता है. `वन मिनट, प्लीज’ पुस्तक में वे प्रश्न करते हैं: `प्रेम के मार्ग पर कौन सी सावधानी बरतनी चाहिए?’ और एक वाक्य में उसका गहन उत्तर देते हैं:`प्रेम की परीक्षा नहीं लेनी चाहिए और (कोई लेना चाहता हो तो) हमें (ऐसी परीक्षा) देने के लिए सदा तैयार रहना चाहिए.’
गुरुदेव यहां इशारा करते हैं कि प्रेम के संबंध में अपेक्षा नहीं रखनी चाहिए, केवल देना है और देते ही रहना है. कवि हरींद्र दवे की एक अति सुंदर और मशहूर पंक्ति है:`किसी का प्रेम कभी कम नहीं होता है, हमारी अपेक्षाएं बढ जाती हैं.’ महाराज साहेब कहते हैं कि किसी को आपके लिए कितना प्रेम है, प्रेम है या नहीं इसकी भी कसौटी नहीं करनी चाहिए. क्यों? प्रेम कोई स्पर्श करने जैसी वस्तु नहीं है कि आप उसे फुट में, लीटर में या किलोग्राम में माप सकें. किसी को आपके प्रति प्यार है या नहीं ऐसी भावना आपके उस व्यक्ति के प्रति भाव पर अधिक निर्भर करती है. सामने वाला व्यक्ति आपसे अपार प्रेम करता है फिर भी आपकी कोई अपेक्षा उसके द्वारा पूरी नहीं होती है तो आपको लगेगा कि उसके मन में आपके लिए प्रेम नहीं है. ऐसा जब होता है तब गलती उसकी नहीं होती बल्कि आपकी स्वयं की होती है ऐसा हम शायद ही समझ पाते हैं. इसके अलावा यह भी हो सकता है कि सामने वाले व्यक्ति के मन में आपके प्रति प्रेम न हो पर आपके अंदर उसके प्रति अपार प्रेम का प्रवाह बह रहा होता है. आप लगातार उसके भले का विचार करते रहते हैं. किसी के प्रति ऐसी कोमल, उमदा, प्यारी भावना हमारे आंतरिक वातावरण को समृद्ध बनाती है. ऐसे प्रेम का प्रतिध्वनि मिले या न मिले लेकिन ऐसी भावनाएं हमें बेहतर इंसान बनाती हैं.
अब अगर किसी के मन में आपके लिए प्रेम है या नहीं या अगर है तो कितना है, इसकी कसौटी करना चाहेंगे तो ऊपर की दोनों परिस्थितियां होंगी तब आपको निराशा ही होगी. नुकसान आपका ही होगा, उसका नहीं. इसीलिए इस संबंध में किसी की परीक्षा नहीं लेनी चाहिए.
लेकिन परीक्षा देने के लिए सदैव तत्पर रहना चाहिए. यदि कोई आपकी कसौटी लेना चाहता है तो आपके स्वर्ण में मिलावट नहीं है ये बात साबित करने के लिए हमें पैमाने पर कसा जा रहा है तो खुशी खुशी पत्थर पर रगड खाने के लिए तैयार रहना चाहिए. ऐसा क्यों? किसी की परीक्षा मुझे नहीं लेनी चाहिए और मुझे परीक्षा देने के लिए सदा तैयार रहना चाहिए ऐसा एकतरफा व्यवहार किसलिए?
गुरुदेव ने साधू बनने के बाद संसार छोडा है लेकिन वे हिमालय जाकर नहीं बसे, हम सभी के बीच रहकर वे अपनी धर्मसाधना करते रहते हैं. इसीलिए वे हम सब की समस्याओं से परिचित हैं, हमारे मन की उलझनों के बारे में उन्हें कण कण की खबर है. गुरुदेव के पास बिना कहे समझ लेने की प्रभुकृपा है. हम अपनी तकलीफ बयान करें उससे पहले ही वे एक नजर में ही पहचान लेते हैं कि हमारी मशीन में कहां गडबडी है, हमारा कौन सा पुर्जा बिगडा है जिसे मरम्मत की जरूरत है. प्रेम या लगाव के बारे में उन्होंने देखा है कि प्रेम एक ईंधन-ल्युब्रिकैंट है जिसके बिना इंजिन नहीं चलता. ऑयल के बिना इंजिन का काम थम जाता है, प्रेम के बिना जिंदगी थम जाती है. अब अगर यह प्रेम पाने के लिए दूसरे व्यक्तियों पर आश्रित रहा जाएगा तो हमारा इंजिन परतंत्र हो जाएगा. दूसरों की ओर से जब जितना प्रेम मिलेगा तभी और उतने ही समय तक हमारा इंजिन चलेगा, ऐसी विषम परिस्थिति पैदा होने पर हमारी जिंदगी बाधित होती है, रुक जाती है. इसके बजाय यदि हम प्रेम करते रहें, दूसरे यदि हमारे प्रेम का प्रमाण मांगें तब उन्हें निरंतर देते रहें तो हमारे इंजिन के लिए बाहर से ईंधन लेने के लिए व्यवस्था नहीं करनी पडेगी. हम ही मैन्युफैक्चरर, हम ही सप्लायर और हम ही कंज्यूमर. जिंदगी में लगाव के बारे में आत्मनिर्भर होना है तो महाराज साहेब का यह एक वाक्य मन में गहराई तक उतार लेना चाहिए. हमारे प्रति दूसरों के बर्ताव में होने वाले चढाव उतार से मन विचलित न हो, हम स्थिरबुद्धि रहकर स्वस्थ तरीके से अपना जीवन चलाते रहें इसके लिए हमारे प्रति दूसरों के प्रेम की परीक्षा लेने का लालच नहीं रखना चाहिए. हमारे मने में दूसरों के प्रति बहनेवाला प्रेम का निर्झर सूख न जाए इसके लिए कोई दूसरा परीक्षा देना चाहता है तो कसौटी के लिए चौबीसों घंटे तैयार रहना चाहिए. मनोचिकित्सक हजारों रूपए की फीस लेने के बाद भी आपकी जो समस्या का निराकरण नहीं कर सकते, वह गुरुदेव बिलकुल सरलता से, सादगी भरी भाषा में, अन्य किसी अटपटे विचारों के चक्कर में आपको डाले बिना समाधान देते हैं.
आज बस इतना ही. पूर्ण करने से पहले `वन मिनट, प्लीज’ में महाराज साहेब ने प्रेम के बारे में लिखी बातों का नवनीत उन्हीं के शब्दों में पांच सवाल जवाब के रूप में प्राप्त करते हैं:
प्र: `लगाव कब नुकसानदायक बन सकता है ?’
उ.: `गलत पते पर दिखाया जाता है तब’
दूसरा सवाल है:`प्रेम की समझ में आनेवाली व्याख्या?’
उत्तर है: `चाहे जितना मिले, पर कम ही लगे, वह प्रेम है.’
तीसरा प्रश्न:`हमारे प्रेम को छोटा करनेवाला परिबल?’
यह प्रश्न जितना गंभीर और उपयोगी है उसका उत्तर भी उतना ही सटीक है. साहेबजी ने एक ही शब्द में उत्तर दिया है:`क्रोध’
ईस एक शब्द के जवाब के बारे में आराम से एकांत में विचार करेंगे तो ध्यान में आएगा कि गुरूदेव ने हमारी पहाड जैसी गलती को सुधारने के लिए एक छोटे शब्द में कितनी सटीक चाबी दे दी है.
चौथा प्रश्न: `प्रेम यानी?’ जिसके जवाब में साहेबजी कहते हैं:`देते रहने के बावजूद कभी कम नहीं होती है, ऐसी संपत्ति.’
प्रेम के बारे में प्रश्नोत्तरी में से चुना गया पांचवां प्रश्न है:`लगाव कब सस्ता बन जाता है?’
जवाब है:`हम जब उसे जहां तहां उंडेलते रहते हैं तब.’
कल जारी.
आज का विचार
प्र:`प्रेम की लडाई में हार किसकी होती है?’
उ:`जो अधिक प्रेम करता है उसकी.’
– आचार्य विजय रत्नसुंदरसूरि
(`वन मिनट, प्लीज’ में)









