मंदिर होने का 263 ठोस प्रमाण सुप्रीम कोर्ट को क्यों नहीं दिखते

गुड मॉर्निंग- सौरभ शाह

(मुंबई समाचार, गुरुवार-14 मार्च 2019)

6 दिसंबर 1992 को जब बाबरी टूटी तब के.के. मुहम्मद की नौकरी गोवा में थी. मुहम्मद ‘मैं हूँ भारतीय’ नामक अपनी आत्मकथा में लिखते हैं कि बाबरी टूटने के बाद उसमें से जो महत्वपूर्ण पुरातात्विक अवशेष प्राप्त हुए उनमें से एक है ‘विष्णु हरिशिला पटल’. इस शिलालेख पर 11वीं 12वीं शताब्दी की नागरी लिपि में संस्कृत भाषा में लिखा गया है कि मांदिर बालि और दशभुजा वाले (रावण) को मारनेवाले विष्णु (श्रीराम विष्णु के अवतार हैं) को समर्पित किया जाता है. 1992 में डॉ. वाई.डी. शर्मा तथा डॉ. के.एन. श्रीवास्तव द्वारा किए गए संशोधन में यहां से विष्णु के अवारों तथा कुशाण काल (ई.स. 100-300) की शिव-पार्वती की मिट्टी की मूर्तियाँ भी मिली हैं. 2003 में इलाहाबाद उच्चन्यायालय की लखनऊ बेंच के कहने से की गई खुदाई में करीब 50 मंदिर के स्तंभ और उन स्तंभों के नीचे ईंट से बना चबूतरा मिला था. इसके अलावा, मंदिर के ऊपरी भाग का निर्माण कार्य मिला था, साथ ही मंदिर में होनेवाले अभिषेक के जल को बाहर निकालने की सुविधा वाला ढाँचा भी मिला. उत्तर प्रदेश भारतीय पुरातत्व सर्वेशण के निदेशक डॉ. राकेश तिवारी ने कोर्ट में जमा की गई रिपोर्ट में बताया है कि बाबरी मस्जिद के अगले हिस्से को समतल करते समय मंदिर से संबंधित कुल 263 पुरातत्व अवशेष मिले हैं.

के.के. मुहम्मद लिखते हैं कि,‘सभी प्रमाणों और पौराणिक अवशेषों का विश्‍लेषण करने के बाद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया- ए.एस.आई.) इस नतीजे पर पहुंचा है कि बाबारी मस्जिद के नीचे एक मंदिर था. इलाहबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ बेंच ने भी इस निर्णय को स्वीकार किया है.’

अब थोडी सी बात अभी की करते हैं. मध्यस्थी करने की सुप्रीम कोर्ट की बात क्यों बिलकुल बेकार है, इसकी बात करते हैं. इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा मान्य किए गए मंदिर के 263 पुरातत्व अवशेष वाला फैसला सुप्रीम कोर्ट के पास भी है. सुप्रीम कोर्ट को या तो उन प्रमाणों को रिजेक्ट करना चाहिए या फिर स्वीकार करना चाहिए. वह रिजेक्ट करने की स्थिति में नहीं है, क्योंकि इस मामले में आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (ए.एस.आई.) से बडी कोई भी विश्‍वसनीय अथॉरिटी भारत में नहीं है. इंडियन काउंसिल ऑफ हिस्टोरिकल रिसर्च (आई.सी.एच.आर) के इरफान हबीब जैसे बुद्धिजीवी मव्वालीगिरी करनेवाले इतिहासकारों का अजेंडा तो सामने आ चुका है. इसीलिए उनके सडक छाप नजरिए को सुप्रीम कोर्ट को नजरअंदाज करना ही पडेगा. इन स्थितियों में सुप्रीम कोर्ट के पास इन प्रमाणों को स्वीकार करके स्पष्ट फैसला देने के अलावा कोई भी दूसरा चारा नहीं है. ये तो अच्छा है कि शिया मुस्लिमों ने राम जन्मभूमि की काफी जमीन से अपना लीगल दावा छोड दिया है और उस भूमि पर मंदिर निर्माण के लिए उसे हिंदुओं को सौंप दिया है तथा दूसरी अच्छी बात ये है कि सुन्नी मुसलमानों ने भले इस मामले में अडंगा डाला है लेकिन कानूनी नजरिए से उनका इस भूमि के साथ कोई लेना देना नहीं है.

लेकिन मान लीजिए कि रामजन्म भूमि के प्लॉट पर शियाओं ने अपना दावा नहीं छोडा होता या ऐसे प्रमाण होते कि इस जमीन पर मालिकाना हक सुन्नियों के पास है तो क्या होता?

ऐसा होने पर भी हिंदुओं को इस जमीन पर राममंदिर बनाने के कानूनी अधिकार है, क्यों? आपकी पत्नी के गले का सोने का हार कोई चुरा ले जाय और उसे गलाकर वह चोर अपनी पत्नी की चूडियाँ बनवा ले तो कोर्ट ये नहीं देखेगा कि चुडियां किसकी कलाई के माप की हैं. कोर्ट यह देखेगा कि उसे बनाने वाला सोना किसके हार से आया है और जिसके हार का सोना हो उसे वह सोना लौटा देना होता है. कोर्ट का यह कर्तव्य है.

मान लीजिए कि मुसलमानों की ओर से ऐसा तर्क दिया जाय कि बाबर के सेनापति मीर बाकी ने यहां का मंदिर तोडा था, इस बात की हमें जानकारी होती तो हमने उस जगह पर मस्जिद बनाई ही नहीं होती. हमने तो (मंदिर तोडे जाने के सौ- दो सौ-तीन सौ साल बाद) ये खाली जगह देखकर यहां पर मस्जिद बना ली तो इसमें हमारी क्या गलती है?

ऐसी स्थिति में भी, उस जगह पर हिंदुओं का ही हक होता है. आप सेकंड हैंड गाडी चेक पेमेंट करके खरीदें और वह चोरी का माल निकल जाए तो आपके हाथ से वह गाडी जो जाएगी ही, आपके पैसे भी जाएंगे और पुलिस चाहे तो गाडी की चोरी में आपकी मिलीभगत की बात कहकर आप पर भी आई.पी.सी. की धारा 120-बी के तहत मामला दर्ज कर लेगी जिसकी सजा आपको उतनी ही होगी जितनी उस गाडी के चोर को मिलेगी. मुझे पता नहीं था कि यह माल चोरी का है, इस बहाने को कोर्ट मान्य नहीं करेगी.

सुप्रीम कोर्ट के पास यह स्वीकार करने के अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं रह जाता कि किसी जमाने में बाबारी मस्जिद जिस जगह पर थी, वह स्थान मूलत: राम जन्मभूमि है और वहां पर बना राम मंदिर तोड कर उसके अवशेषों पर मस्जिद खडी की गई है, इसीलिए वो जगह हिंदुओं को सौंप देनी चाहिए.

लेकिन सुप्रीम कोर्ट किन्हीं कारणों से यह फैसला नहीं देना चाहता. इसीलिए उसने मध्यस्थी का अडंगा लगाते हुए कहा कि बाबर ने क्या किया और क्या नहीं किया, इससे हमें कोई लेना-देना नहीं है. क्यों भई? क्यों कोई लेना-देना नहीं है? ये प्रमाण हैं. आप हमेशा साक्ष्यों के आधार पर ही तो फैसला सुनाते हैं, तो फिर इस केस को क्यों मध्यस्थी-वध्यस्थी के चक्कर में डालते हैं?

एक मिनट!

बका: पका, मुझे एक बात समझ में नहीं आती.

पका: क्या?

बका: गर्लफ्रेंड को कॉफी शॉप में जब मिलते हैं तब उसकी आवाज रेडियो से भी मद्धिम होती है पर शादी के बाद घर में जब घर लाते हैं तब न जाने कहां से वूफर लग जाता है!

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