गुड मॉर्निंग
सौरभ शाह
एक गांव में एक विदेशी आता है. गांव के एक दुकानदार को दूसरे दुकानदार से लडाकर दोनों का माल हडप कर लेता है और अपने देश लौट जाता है. ऐसी कहानी का प्लॉट जम्मू – कश्मीर के बारे में रचा गया. जम्मू के डोगरा महाराजा गुलाब सिंह को पंजाब के सिखों के साथ लडाकर अंग्रेजों ने जम्मू-कश्मीर को पंजाब के शासन से अलग कर दिया और गुलाब सिंह के साथ समझौते पर हस्ताक्षर मुहर लगवाकर जम्मू-कश्मीर गुलाब सिंह को सौंप दिया, लेकिन अंहतिम सिरा अपने हाथ में रखा. गुलाब सिंह की मृत्यु सितंबर १८८५ में हुई और ब्रिटिश सरकार ने तुरंत उनके पुत्र महाराजा प्रताप सिंह कहलवाया कि अब आपके राज्य में एक रेसिडेंट पॉलिटिकल ऑफिसर रहेगा. राज्य में ब्रिटिश रेसिडेंसी के खडे होने के तीन ही साल में महाराजा प्रताप सिंह जिन्हें अपना मान बैठे ऐसे रेसिडेंट कर्नल पैरी एस. नेस्बेट ने एक चाल चली. कर्नल नेस्बेट ने सार्वजनिक रूप से आक्षेप लगाया कि प्रताप सिंह ने ब्रिटिश सरकार को धोखा देने का षड्यंत्र रचते हुए रूस के जार को, महाराजा दिलीप सिंह को तथा जम्मू-कश्मीर में रहने वाले अपने वफादारों को पत्र लिखे हैं और वे पत्र इस समय ब्रिटिश सरकार के कब्जे में हैं. महाराजा प्रताप सिंह ने कहा कि ऐसा कोर्ई पत्र उन्होंने खुद या अपनी ओर से किसी अन्य से नहीं लिखवाया है. यह ब्रिटिशों की ओर से फैलाया गया झूठ है. प्रताप सिंह का हाथ मरोड कर उनके जरिए अपना इच्छित कार्य करवाने के लिए ब्रिटिश सरकार द्वारा रचे गए इस षड्यंत्र में प्रताप सिंह पूरी तरह से फंस जाएं इसलिए खुद प्रताप सिंह के छोटे भाई अमर सिंह को लालच देकर ब्रिटिशों ने अमर सिंह से प्रतिज्ञापत्र लिखवाया कि ये पत्र नकली नहीं हैं, असली हैं.
इसके बाद यानी १८८८ के दौरान जम्मू-कश्मीर में जो राजनैतिक आंधी चली उसका अंजाम ब्रिटिश जैसा चाहते थे, वैसा ही हुआ.
महाराजा प्रताप सिंह को राजगद्दी छोडनी पडी और इतना ही नहीं, खुद सामने से आकर गद्दी छोड रहा हूं और अपने दोनों भाइयों राजा अमर सिंह तथा राजा राम सिंह सहित `व्यवस्थापन समिति’ राज्य के प्रशासन को जिम्मेदारी सौंप रहा हूं ऐसा लिखित में देकर अपने ही हाथों से अपने पैरों पर कुल्हाडी मारनी पडी. महाराजा प्रताप सिंह की इस `ऑफर’ को ब्रिटिश सरकार ने स्वीकार कर लिया. संपूर्ण सत्ता छिन जाने के बाद महाराजा प्रताप सिंह ने ब्रिटिशों की ओर से सत्ता के कुछ टुकडे करवाए और प्रताप सिंह ने विवश होकर उन टुकडों को स्वीकार कर लिया. सिंह भूखा रहेगा पर घास नहीं खाएगा ऐसी शान पर संयोगों का प्रहार ऐसा पडा कि अंत में भूख के मारे घास खाने तक की तैयारी सिंह दिखाता है और तब उसे घास तक नसीब नहीं होती.
महाराजा प्रताप सिंह शायद इस बात को अच्छी तरह से समझते थे. प्रताप सिंह के वारिस महाराजा हरि सिंह १९२५ में जम्मू – कश्मीर की सल्तनत में तख्तनशीन हुए. १९४८ में भारत के साथ मिल जाने का फैसला उस समय हरि सिंह की सरकार ने किया था. हरि सिंह के पुत्र डॉ. कर्ण सिंह भारत के एक बौद्धिक राजनेता के रूप में और विश्व हिंदू परिषद के एक संस्थापक के रूप में जाने गए. ३५ वर्ष की उम्र में केंद्रीय मंत्री बनने वाले उस समय के वे सबसे पहले राजनेता थे.
कश्मीर पहले से ही मुस्लिम बहुसंख्या वाला ऐसा प्रदेश रहा जिस पर दशकों तक जम्मू के डोगरा वंश के शासकों ने राज किया. डोगरा शासन. महाराजा हरि सिंह जब सिंहासन पर बैठे तब तुरंत ही उन्होंने अपना सारा ध्यान कश्मीर की प्रजा के प्रश्नों पर केंद्रित किया, लेकिन दुर्भाग्य से हिंदू राजा अपनी मुस्लिम रियाया का प्रेम और विश्वास संपादित करने में विफल रहे.
१९३१ में जम्मू-कश्मीर राज्य के इतिहास में दर्ज पहला सबसे बडा दंगा हुआ. १९३१ में ही प्रकाशित `रिपोर्ट ऑफ द श्रीनगर रायट कमिटी’ के दस्तावेजों में मुस्लिम – हिंदू दंगे का सारा विवरण मौजूद है. एक तरफ मुस्लिम जनता और दूसरी ओर डोगरा शासक तथा कश्मीरी पंडित- इस तरह से दो फाड हो गए. मस्लिम जनता ने इस घटना के बाद खुद को अधिक संगठित करने का निश्चय किया. नवंबर १९३२ में श्रीनगर में आयोजित तीन दिवसीय परिषद में सारे राज्य के डेलिगेट्स को निमंत्रित किया गया. तीन दिन के अंत में जम्मू और कश्मीर मुस्लिम कॉन्फरेंस की स्थापना हुई और इसके साथ राज्य में अब तक चुप बैठी मुस्लिम जनता की ओर से बोलने वाले एक युवा मुस्लिम नेता का उदय हुआ. शेख मोहम्मद अब्दुल्ला. जवाहरलाल नेहरू ने शुरुआत में शेख अब्दुल्ला के साथ आरंभ में बनावटी मतभेद दिखाए लेकिन बाद में उन्हें कश्मीर में जो ढील, वही नीति आज की कश्मीर समस्या के मूल में है. शेख अब्दुल्ला के पुत्र फारूख अब्दुल्ला ने पिता की गद्दी संभाली. रंगीन मिजाज फारुख अब्दुल्ला शबाना आजमी को अपनी मोटर साइकिल पर सैर कराते थे. फारूख अब्दुल्ला के पुत्र ओमर अब्दुल्ला ने भी अपनी विरासत को आगे बढाते हुए एक जानी मानी अंग्रेजी न्यूज चैनल की एंकर के साथ प्रेम किया.
१९४७ में भारत आजाद हुआ. महाराजा हरि सिंह ने अक्टूबर १९४८ में पाकिस्तान द्वारा कबाइलियों के वेश में भेजे गए सैनिकों के हमले से बचाव के लिए भारत के साथ जुडने का उचित फैसला किया. हरि सिंह किसी समय जम्मू-कश्मीर को एक स्वतंत्र और निरपेक्ष राज्य – स्विट्जरलैंड जैसा बनाने का सपना देखा करते थे. एक ऐसा कश्मीर जो न तो भारत में विलीन होगा, न ही पाकिस्तान के पाले में जाएगा. खैर यह एक नामुमकिन सपना था. राजा हरि सिंह का वह ख्याली पुलाव था. हरि सिंह की इच्छा के अनुसार यदि कश्मीर की रचना हुई होती तो कुछ ही वर्ष में भारत या पाकिस्तान नहीं, बल्कि चीन या रूस उस पर कब्जा करके बैठ जाते. कश्मीर की भौगोलिक रचना के कारण उसके पडोसी तथा दुनिया के अनेक ताकतवर देशों को उसे हडपने में खूब रुचि है, और ऐसा होना स्वाभाविक था.
कश्मीर की इस विशिष्टता के कारण उसका यह इतिहास तथा उसी प्रकार वहां की सामाजिक परिस्थिति के चलते, और इसके अलावा नेहरू की अल्प दृष्टि के कारण भारतीय संविधान में धारा ३७० को स्थान दिया गया. इस धारा में ऐसी ऐसी बातें नेहरू और उनके सहयोगियों द्वारा शामिल की गई हैं जिसके खिलाफ न सिर्फ सरदार वल्लभभाई पटेल थे, बल्कि खुद बाबासाहब आंबेडकर ने भी कई मामलों में प्रत्यक्ष रूप से विरोध दर्ज कराते हुए नेहरू की नाराजगी मोल ली थी.
इस धारा के अप्रकट प्रावधानों के बारे में यदि हम समझ लेते हैं तो उसे रद्द करना क्यों अनिवार्य है, इस बारे में हम समझ सकते हैं.
आज का विचार
भूतकाल में जब भी कांग्रेस ने केंद्र और राज्यों में समर्थन वापस लिया है तब क्यों किसी मीडियावाले ने नहीं पूछा कि भाई, आपने समर्थन दिया ही क्यों था.
– वॉट्सएप पर पढा हुआ
एक मिनट!
बका: अरे पका, इस विज्ञापन को पढा तूने?
पका: कैसा विज्ञापन?
बका: फेक आईडी बेचनी है.
पका: क्या लिखा है?
बका: लिखा ह: ३४४५ फ्रेंड्स, २२७८ फॉलोअर्स और चार चाचा भी हैं जो हर महीने पांच सौ का रिचार्ज करा के देते हैं!








