गुड मॉर्निंग- सौरभ शाह
(मुंबई समाचार, शनिवार, १५ दिसंबर १८)
लिखना और बोलना सेकंडरी क्रियाएँ हैं. प्राइमरी क्रिया पर विचार करना है. विचार करने के बाद लिखा जाता है या बोला जाता है और विचार करने का क्या मतलब है? यहां-वहां से चुराकर कर जुटाए गए विचारों को रंगरोगन करके अपने नाम से चढा देने की क्रिया को विचार नहीं कहा जाता. दुकान के सामनेवाले फुटपाथ पर एन्क्रोचमेंट करनेवाला दुकानदार जिस प्रकार से ये नहीं कह सकता है कि सब भूमि गोपाल की, उसी प्रकार से यहां-वहां से उठाकर विचारों को जुटानेवाला ऐसा नहीं कह सकता है कि इस दुनिया में मौलिकता जैसा कुछ है ही नहीं, जो कुछ भी है वह पहले ही कोई कह गया है.
पहले किसी ने कुछ कहा था. वह उसकी मौलिकता थी. वेद उपनिषदों के रचयिताओं के पास उनकी मौलिकता थी. रामायण और महाभारत के मूल ग्रंथों की रचना करनेवालों के पास उनकी मौलिकता थी. मौलिकता की परंपरा तभी से चली आ रही है. जो लोग कोई मौलिक विचार नहीं कर सकते, केवल उठाईगिरी करके लिखते-बोलते हैं, वही अपनी कमियों को छिपाने के लिए कहते हैं कि इस दुनिया में मौलिक कुछ भी नहीं है.
मौलिकता उधार में नहीं मिल सकती. मौलिकता सीखी नहीं जा सकती. मौलिकता भगवान सभी को नहीं देते. यह उन्हीं को देते हैं जिनमें इस आशीर्वाद के बीज से वृक्ष पनपने के लिए सक्षम उपजाऊ भूमि होती है और जो अपनी निष्ठा जोडकर उस भूमि में रोपे गए बीज का पोषण कर सकते हैं, खूब पसीना बहाकर उसे खाद-पानी की अनुकूल आपूर्ति करते रहते हैं.
मौलिक सृजन चाहे किसी भी क्षेत्र का हो, आईफोन से लेकर नए राग तक का किसी भी सृजन के बिना यह दुनिया अधूरी होती. सेलफोन तो दो दर्जन कंपनियॉं बनाती होंगी, कंप्यूटर या संगीत सुनने के पर्सनल साधन भी अनेक कंपनियॉं मनाती होंगी, लेकिन स्टीव जॉब्स की सृजनात्मकता लिफाफे में समा जाने की क्षमतावाले आकार में लैपटॉप या कैसेट डालने के जंजाल के बिना आईपॉड बना सकती है. रंग बेचनेवााली दो दुकानें हैं, लेकिन एक में मकान और घर की दीवारों को रंगने के डिब्बे बिकते हैं. दूसरी दुकान में कैनवास पर सृजन करनेवाली ऑयल पेंट्स की ट्यूबें बिकती हैं. एक फिल्म में कहा गया था कि आपको मोटे ब्रश से लोग जो कहते हैं, उस रंग में दीवारें रंगनी हैं या फिर बारीक तूलिका से आपको मनचाहे रंगों का उपयोग करके मौलिक चित्र बनाने हैं, यह आप पर है. आपके पास जैसा टैलेंट हो, जैसी इच्छा हो, जैसी हैसियत हो और जैसी निष्ठा हो उस पर आपका निर्णय आश्रित है. रंगाई का कॉन्ट्रैक्ट लेनेवाले कभी कभी चित्र बनाने वालों से कई गुना अधिक कमा लेते हैं. छोटे से कैनवास पर चित्र बन जाता है तो चार घंटे में अद्भुत कलाकृति का सृजन हो जाता है अन्यथा दो वर्ष की मेहनत के बाद चित्र पूरा होता है. यह सब ऊपर वाले के हाथ में है.
जो सत्व युक्त है वही स्थायी है, चिरकालिक है. रातोंरात बिना मेहनत के मिल जानेवाली कोई भी चीज टिकनेवाली नहीं है. उबासी लेते समय बताशा मुंह में आ जाएगा इसका इंतजार करनेवाले अंत में बाय, बॉरो ऑर स्टील में विश्वास करनेवाले हो जाते हैं. जिस वस्तु को खरीदा नहीं जा सकता, उधार नहीं लिया जा सकता उसे चुरा लो, हथिया लो.
बीते दो सप्ताह में ऐसी दो घटनाएँ हुई हैं जिनका यह फ्रस्ट्रेशन है. २९ नवंबर को ऐज़ यूजुअल सुबह सुबह ‘अरोरा’ में रजनीकांत की ‘टू पॉइंट ओ’ देखने गए थे. निराश होकर लौटे. ८ दिसंबर को षण्मुखानंद में ‘आठ प्रहर’ में लगातार चौथे वर्ष गया. पूरा २४ घंटे का जागरण था. दोनो ही जगहों पर मजा तो खूब लिया लेकिन कोई सत्व नहीं पा सका. रजनीसर की फिल्मों में ‘सत्त्व ’ खोजना नहीं होता लेकिन वहां पर सत्त्व यानी मनोरंजन जो कि नहीं मिला. इन दोनों ईवेंट्स के हम जबरदस्त फैन हैं, आपको तो पता है ही. नेक्स्ट पर भी मिस नहीं करनेवाले हैं, यह भी पक्का है. लेकिन जहॉं मौलिकता खत्म हो जाती है और देखादेखी प्रवेश कर जाती है वहां पर बाह्य चमक दमक चाहे जितनी भी हो, पर अधिक आनंद नहीं मिलता. मौलिकता कुछ भी मिले, भले ही वह एक बूंद भर ही क्यों न हो, हम जान न्यौछावर कर देने के लिए तैयार हैं, लेकिन पेंट या पेंट के डिब्बे बेचने से करोडों की कमाई हो रही हो तो भी वह नहीं करना. बारीक तूलिका से होनेवाली चित्रकारी ही करनी है. फिर भले ही चित्र पूरा करने में वर्षों बीत जाएँ. यहॉं जल्दबाजी किसे है?
आज का विचार
सविनय सूचित करना है कि चाइनीज़ मांजे के बारे में मैसेज भेजना शुरू करना है या अभी वक्त है?
-वॉट्सएप पर पढा हुआ!
एक मिनट!
बका की पत्नी: मैं आज शाम को खाना नहीं बनानेवाली, थक गई हूँ. थक…
बका: हॉं भई मत बनाना….हम भी थक गए हैं.









