गुड मॉर्निंग- सौरभ शाह
(मुंबई समाचार, सोमवार – २९ अक्टूबर २०१८)
रजनीश ने कहा है: सत्य की तरफ केवल वही जा सकता है जो भेडचाल से ऊपर उठे, जो धीरे धीरे अपने को जगाए और देखने की चेष्टा करे कि जो मैं कर रहा हूं, वह करना भी था या सिर्फ इसीलिए कर रहा हूं कि और लोग कर रहे हैं.
रजनीश की बात यहीं खत्म होती है. अपनी बात करते हैं. हर दिन हमारे आस पास पचास हजार घटनाएँ होती हैं जिनमें से पांच हजार हमारे पास पहुंचती हैं जिसमें से पांच सौ घटनाओं के बारे में हम विचार करते हैं और पचास के बारे में हम मन ही मन कमेंट्स करते हैं, विश्लेषण करते हैं और फिर उसमें से पांच बातें दूसरों तक पहुंचाते हैं. मेरा कहना है कि क्या ये जरूरी है?
प्लेन में बैठते समय आप पायलट को सलाह नहीं देते हं कि उसे विमान किस तरह से उडाना चाहिए, रिक्शा में बैठते समय रिक्शाचालक को क्लच, गियर और एक्सिलरेटर के बारे में नहीं बताते लेकिन प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी को देश किस तरह चलाना चाहिए इस बारे में ऐसे लोग भी सलाह देने आ जाते हैं जिन्हें अपनी बहती नाक तक पोंछने नहीं आती. कोई पप्पू इस देश की परिस्थिति के बारे में भद्दे कमेंट करके छी करेगा तो उसका टुकडा बदलने के लिए हजारों सेकुलर, वामपंथी और यश्मिस्ट पॉलिटिकल समालोचक दौड पडते हैं.
देश और दुनिया में जो कुछ भी होता है, उस हर घटना की केवल पच्चीस प्रतिशत जानकारी ही क्यों न हो लेकिन मूर्ख लोग उसमें और पच्चीस प्रतिशत कल्पना जोडकर, पच्चीस प्रतिशत गप्प मिलाकर और शेष पच्चीस प्रतिशत अपना पूर्वाग्रह डालकर हर दिन टीवी पर सजे मछली बाजार में, अखबारों के कॉलम में और चौराहे पर पानवाले की गुमटी पर हाजिर हो जाते हैं. तीनों ही जगहों पर चर्चा एक समान ही होती है.
सोनिया गांधी और उनके परिवार जनों तथा उनके साथ सत्ता में साझेदारी कर चुके नेताओं को पता है कि उन सभी के पापों का घडा भर चुका है. सत्ता पर रहकर उन लोगों ने जो भी काले काम किए हैं उन सभी की कलई मोदी बिना खोले नहीं रहेंगे. कांग्रेसियों ने जिन जिन लोगों के सामने बिस्किट के टुकडे डाल डाल कर भौंकना बंद करवाया था उन अकेमेडिशियन्स, एनजीओ चलानेवालों, मीडियावालों और पार्टी के कार्यकर्ताओं को भी पता है कि पिछले साढे चार साल में उन लोगों की दुकानों पर ताले लग गए हैं. दशाकों से हराम का खानेवाले ये परजीवी कीट अब मरने को हैं और २०१९ में मोदी जाएं, राहुल आए, ऐसा जाप कर रहे हैं. उन्हें पता है कि बहुत जल्दी वे सभी डायनासौर की तरह विलुप्त हो जाएंगे. एक्सटिंक्ट हो जाएंगे. देश बदल रहा है. सारी पुरानी सडन साफ हो रही है. सेकुलर और लेफ्टिस्ट मेंटैलिटी वालों को पता है कि अब तो उन्हें गटर साफ करने का काम भी कोई नहीं देनेवाला. ऐसा नहीं है कि वे ऐसा किसी भी प्रकार का मेहनत वाला काम करना चाहते हैं. कांग्रेस के ७ दशक के शासन में सरकारी अनुदान, सबसिडी, फंड के दम पर बैठे बैठे कमाई करके अय्याशी से जीनेवाली इस सेकुलर, वामपंधी, छद्म इंटेलेक्चुअल् जनता का अस्तित्व रोहिंग्या जैसा बन चुका है. कोई भी उन्हें स्वीकारने के लिए, आश्रय देने के लिए तैयार नहीं है. इन शरणार्थियों, निराश्रितों के पास अभी दूसरा कोई भी चारा नहीं है इसीलिए वे दिन रात ट्विटर पर, फेसबुक पर, टीवी डिबेट्स में और अखबारों के करेंट विषयों की कॉलमों में मोदी के खिलाफ जहर उगल रहे हैं, जो कि स्वाभाविक है. उनके बहकावे में नहीं आना चाहिए. वे अपने वमन पर चांदी का वर्क लगाकर आपके सामने रखें तो उसे लेना नहीं चाहिए. सचेत रहना चाहिए. उनका आशय स्पष्ट है. वे नहीं चाहते हैं कि मोदी को दूसरा टर्म मिले. वे नहीं चाहते हैं कि हिंदू राष्ट्र, हिंदू धर्म और हिंदू जनता सुख, शांति और सुरक्षा से जिए और अधिक से अधिक समृद्ध होती रहे. वे नहीं चाहते कि भारत दुनिया का नंबर एक राष्ट्र बने. वे नहीं चाहते हैं कि वामपंथियों की पोल और सेकुलरों की बदमाशी सामने आ जाए. वे नहीं चाहते हैं कि आर.एस.एस. जैसे राष्ट्रवादी संगठनों की निष्ठा, कर्मठता और संस्कार भारत के करोडों लोगों तक पहुंचे.
इसीलिए वे २५+२५+२५ का फॉर्मूला बेलगाम बोलने-लिखने लगे हैं. रोज के अनेक उदाहरण आपको दिए जा सकते हैं. लेटेस्ट उदाहरण लीजिए. खुद प्रधान मंत्री को पता नहीं है कि सी.बी.आई. का अभी का झगडा असल में किन कारणों से सार्वजनिक विवाद में रूपांतरित हुआ है. सी.बी.आई. के नंबर और नंबर टू को प्रधान मंत्री ने मिलने के लिए बुलाया. सारी जानकारी ली. फ्रॉम द हॉर्सेस माउथ. बेशक, मिलने से पहले मोदी ने अपनी तरह से अन्य सोर्सेस से जानकारी प्राप्त की ही होगी. लेकिन मामला इतना अटपटा है कि जब तक वे खुद उन दोनों की बात प्रत्यक्ष नहीं सुनेंगे तब तक कौन सच्चा है, और कौन बदमाशी कर रहा है, उसका अंदाजा नहीं मिलेगा. ऐसी बातों में कई बार तीसरा एंगल भी छिपा होता है जिसके बारे में उन जैसे चाणक्य बुद्धि राजनेता को ही जानकारी हो सकती है.
इस तरफ पीएम खुद सत्य जानकारी तक पहुंचने के लिए इतनी मेहनत कर रहे हैं तो उस परिस्थिति में हमारे पास उस सारी घटना की २५ प्रतिशत जानकारी भी नहीं होगी. इसके बावजूद टीवी के बोलबच्चन तथा अखबार के कलमवीर अपनी मूर्खता का प्रदर्शन करने का लोभ नहीं चोड सकते.
जिन पुरुषों को संदेह होता है कि उनकी अपनी पत्नी मंदिर जाकर क्या करती होगी, तो ऐसे लोगों को तलाक लेकर मन संतुष्ट कर लेना चाहिए. और यदि ऐसा करना संभव न हो तो प्रेम से मिलजुलकर आनंद से जीवन चलाना चाहिए.
जिन्हें लग रहा है कि राफेल के बारे में मोदी गाफिल रहे और नीरव मोदी- चोक्सी- माल्या को भगाने में मोदी ने मदद की है और सी.बी.आई. के विवाद में मोदी गिल्टी हैं तो उन लोगों को खुद को मोदी प्रेमी या मोदी सपोर्टर कहलाने के बजाय तत्काल सोनियाजी के शरण में चले जाना चाहिए.
और यदि अपने नेता में आपको श्रद्धा हो, मोदी की इंटीग्रिटी में विश्वास हो तो दूसरों की बातें अनसुनी करके अविचल रहना चाहिए, बात बात पर संदेह नहीं करना चाहिए, आनंद से कैरम खेलना चाहिए और जूस पीना चाहिए.
आज का विचार
दिवाली के लिए मोहनथाल बना कर रखा है. अब सांचे की साइज के बारे में सुप्रीम कोर्ट से गाइडलाइन्स आने की राह देख रहा हूं. फिर मिठाई बनाऊंगा.
– वॉट्सएप पर पढा हुआ
एक मिनट!
पका: पटाखे फोडने की परंपरा का उल्लेख रामायण में कहीं नहीं है ऐसा सुप्रीम कोर्ट का कहना है.
बका: रामायण में तो सुप्रीम कोर्ट का भी कहीं उल्लेख नहीं है.








