(गुड मॉर्निंग: चैत्र शुक्ल षष्टी, विक्रम संवत, २०७९, गुरुवार, ७ अप्रैल २०२२)
आज यहां आए मुझे एक सप्ताह पूरा हो रहा है. एक अप्रैल, शुक्रवार की सुबह ग्यारह बजे आया था. आज सात अप्रैल गुरुवार है.
यहां आने के बाद यह जगह दिनोंदिन इतनी पसंद आती जा रही है कि घर लौटने के बाद रोज यहां की याद आएगी. २१ मई को मुंबई लौटने के लिए जब निकलूंगा तब योगग्राम को मैं बहुत ही मिस करूंगा. उस समय मुझे ऐसा कोई अफसोस न रह जाय कि मैंने योगग्राम में ये नहीं किया, वह नहीं किया, ये नहीं देखा, फलां अनुभव नहीं लिया, फलां लोगों से नहीं मिला-इसीलिए यहां बीत रहे हर मिनट को दुर्लभ मानकर उसका सदूपयोग कर रहा हूँ.
कल योगपीठ में स्वामीजी के सान्निध्य में बापू की कथा सुनने का अभूतपूर्व लाभ मिला. बापू के व्यासपीठ पर पधारने से पहले `संगीतनी दुनिया’ के नीलेशभाई वावडिया और नरेशभाई वावडिया से मिला. बापू की कथाओं के ऑडियो-वीडियो की भारी-भरकम जिम्मेदारी वर्षों से वे संभाल रहे हैं. महुवा-तलगाजरडा में और बापू की कथाओं में अक्सर उनसे मुलाकात होती रही है. अब तो आत्मीयता हो गई है. बापू की संगीत मंडली के शहनाई वादक गजानन, बेन्जोवादक हितेश, तबलावादक पंकज भट्ट, हार्मोनियमवादक हकाभाई, गायकभाई तथा दलाभाई-सभी से दो दो मिनट मिल लिया. दो वर्ष के लंबे अंतराल के बाद सबसे प्रत्यक्ष मिलकर सानंद देखकर खूब प्रसन्नता हुई. संगीतनी दुनिया के अन्य सहायक भी मिले. इन सभी मित्रों को मुंबई में पवई के अपने घर में बुलाया था. पहले दिन बापू और अन्य मेहमान तथा दूसरे दिन ये सभी मित्र. ताकि उनके साथ एकांत में बातें हो. खाने में दोनों दिन पानीपुरी, भेलपुरी, सेवपुरी….योगग्राम के वातावरण में ऐसे व्यंजनों को याद नहीं करना चाहिए! लेकिन सभागृह में एक मित्र ने मुझसे मिलकर कहा,`सौरभभाई, आपके हाथ की पानीपुरी तो वास्तव में प्रेमपुरी थी!’
योगग्राम में आकर मेरे लिए योगाभ्यास जितना अनिवार्य है, उतना ही अनिवार्य मेरे लिए बापू की कथा का श्रवण करना है. हर समय प्रत्यक्ष जाना संभव नहीं है लेकिन बार बार टीवी पर लाइव कथा सुनने बैठ जाता हूं. सुविधा हो और कहीं बाहर रहें तो मोबाइल पर.
वीडियो या यूट्यूब देखने का मेरा अटेंशन स्पैन काफी छोटा है.अधिक से अधिक पांच-दस मिनट बस. उसके बाद तुरंत ऊब जाता हूं. किसी अन्य गतिविधि में लग जाता हूं. लेकिन प्रधान मंत्री बोल रहे हों, स्वामीजी योग सिखा रहे हों या बापू की कथारस में खिंचे जा रहे हों तो समय कहां बीत जाता है, उसका पता ही नहीं चलता.
सर्दी-खांसी-हल्का बुखार तो सचमुच में मेरे लिए आशीर्वाद स्वरूप है. डॉक्टर आराम करने को कहते हैं और मुझे लेख लिखने का समय मिल जाता है. आज पूरे दिन के दौरान मैने तीसरे दिन, चौथे दिन, पांचवें दिन और छठें दिन का पौना लेख-इस तरह से कुल सात हजार के आसपास शब्द लिखे. अखबार में एक कॉलम हजार शब्दों का होता है. सात दिन के कॉलम जितना मैटर एक ही दिन में लिखा. खूब स्फूर्ति से लिखा. अच्छा लिखा.
मेरे लिए सब जितना जरूरी है, उसी तरह लेखन भी अनिवार्य है. एक-दो दिन कागज पर कलम न चला लूं तो लिटरली नाखुशी सी महसूस होती है. योगग्राम में आकर पहले दो दिनों के बारे में लिखने के बाद लगातार चार दिन कुछ नहीं लिखा था. जिसका मानसिक असर स्ट्रेस के रूप में और शारीरिक असर अनफिट होने जैसा कभी कभी लगता है.
आज अच्छा ये हुआ कि सर्दी-खांसी-मंद बुखार के कारण डॉक्टर ने मुझे कुछ दिन बेडरेस्ट करने की सलाह दी है. आज मैं केवल फलाहार करनेवाला हूं. अन्य उपचार लंग (फेफडे की) बस्ती, मधुतालिका बस्ती इत्यादि में मुझे आगले कुछ दिन नहीं जाना है. इसके बदले एंटी कोल्ड मसाज लेना है-तलवे पर और हथेली पर लहसुन का तेल, लौंग का तेल, कलौंजी इत्यादि औषधियों को उबालकर जो मिश्रण तैयार होता है, उससे मालिश करना.
आज पूरे दिन के दौरान मैने तीसरे दिन, चौथे दिन, पांचवें दिन और छठें दिन का पौना लेख-इस तरह से कुल सात हजार के आसपास शब्द लिखे. अखबार में एक कॉलम हजार शब्दों का होता है. सात दिन के कॉलम जितना मैटर एक ही दिन में लिखा. खूब स्फूर्ति से लिखा. अच्छा लिखा. इससे पूर्व वर्षों पहले, ढाई दशक पहले, मुझे परिवार के साथ श्रीनाथजी के दर्शनार्थ नाथद्वारा जाना था, उस समय सबेरे से शुरू हो गया था और देर रात तक जागकर एडवांस में छह लेख पूरे किए थे. उस समय फैक्स वगैरह थे. ईमेल नहीं था.
आज मैने छह नहीं सात लेख जितना मैटर लिखा और वह भी ढाई दशक पहले जितना समय लगा था उससे भी आधे समय में लिखा और उसके बाद भी कोई थकान नहीं. उलटे टेन्शन गायब और स्फूर्ति ही स्फूर्ति. योगग्राम के भौतिक-मानसिक वातावरण का यह प्रताप है. इसी तरह से चलता रहा तो सौंवे वर्ष में मैं भारत की फुटबॉल टीम में ब्राजील के विरुद्ध खेल रहा होऊंगा.

आज सबेरे गार्डन में स्वामीजी के सान्निध्य में योगाभ्यास करते समय उत्तर प्रदेश राज्य के भूतपूर्व डी.जी.पी. (डायरेक्टर जनरल ऑफ पुलिस) मिले, यहां आने के दूसरे ही दिन उनके साथ परिचय हुआ. लखनऊ में रहते हैं. गोपाल गुप्ता उनका नाम है. मेरे पास ही अपनी योगमैट बिछाकर जिस चपलता से वे एक के बाद एक आसन कर रहे थे उसे देखकर मैं बहुत प्रभावित हुआ, प्रेरित भी हुआ. अंदाजा लगा लिया कि उम्र में मुझसे बडे होंगे. साढे सात बजे योगाभ्यास पूरा होने के बाद मैने उनके समक्ष भाव व्यक्त किया. फिर आगे बात हुई तब मुझे उनके और उन्हें मेरे काम के बारे में जानकारी मिली, वे वास्तव में बापू की कथा सुनने आए थे और योगपीठ में ही रहते थे. लेकिन प्रतिदिन सबेरे यहां आकर योगाभ्यास कर रहे थे. साथ ही उनका अंगरक्षक भी आता है. हर दिन बापू की कथा और रोज स्वामीजी के सान्निध्य में योगाभ्यास. मेरी ही उम्र के हैं.
पहली मुलाकात के अंत में उन्हें एक काम सौंपा. उन्होने खुशी खुशी मेरा निवेदन स्वीकार कर लिया. मुंबई से निकलते समय यूट्यूब वीडियो के इनपुट के बैकअप के लिए सॉलिड स्टेट ड्राइव लेना भूल गया था. हरिद्वार में एकाध घंटे घूमकर तलाश की लेकिन पता चला कि ऋषिकेश के क्रोमा स्टोर में मिलेगी. सिर्फ इसके लिए वहां तक जाने का अर्थ नहीं
था, इतना वक्त भी कहां था. हरिद्वार में ही अचानक याद आया और `संगीतनी दुनिया’ वाले नीलेशभाई वावडिया को फोन किया. सैनडिस्क की १ टेराबाइटवाली एस.एस.डी. खरीदकर मेरे लिए ले आएंगे? नीलेशभाई ने तुरंत हां कर दी-खोजकर खरीद लूंगा, आप बापू की कथा में आएंगे तब आपको दे दूंगा.
दूसरे दिन उनका व्हॉट्सऐप आ गया कि ड्राइव आ गई है, कथा में मिलेंगे. उनका संदेश आने के बाद मैने उन्हें जीपे कर दिया लेकिन कथा में कब जा पाएंगे और कब नहीं, ऐसा उस समय निश्चित नहीं था. मन में सोचा था कि कोई व्यवस्था हो जाएगी. रामजी के भरोसे सारा जीवन बिताया है, कई मुसीबतों से उन्होंने उबारा है, तो यह एस.एस.डी क्या चीज़ है?
और भगवान ने मेरा काम करने के लिए साक्षात डी.जी.पी. को भेज दिया! उनके द्वारा मुझे योगग्राम में बैठे बैठे ड्राइव मिल गई. वैसे तो बाद में मैं खुद भी कथा में गया लेकिन उससे पहले ही पेन ड्राइव मुझे मिल गई थी. डीजीपी गुप्ता के साथ अब परिचय हो गया था, इसीलिए वे मुझसे पूछ रहे थे कि,`आप यहां से भी अपनी ऑफिस चलाते हैं? कैसे कर लेते हैं सबकुछ?’
मैने उनसे कहा था कि मुझे प्रतिदिन कुल मिलाकर कम से कम दो से तीन घंटे चाहिए. लेख लिखकर यहां से अहमदाबाद जाता है. टाइपसेटिंग होकर आने के बाद प्रूफ रीडिंग कर गलतियां सुधार कर और एडिटिंग करके उसे अपलोड करने के लिए पूना भेजता हूं और उसे हिंदी वर्ज़न के लिए मुंबई के सत्यप्रकाश मिश्रा को भेजता हूं.
पूना में मेरे मित्र और `न्यूज़प्रेमी’ के एड्मिन विनयभाई खत्री आवश्यक संस्कार करके मेरे फाइनल अप्रूवल के बाद लेख शेड्यूल करते हैं. ऑनलाइन प्रकाशित करने के बाद मेरे तकरीबन अस्सी व्हॉट्सऐप ग्रुप्स में, एफबी-टेलीग्राम इत्यादि पर वे पोस्ट करते हैं. जो भी कमेंट्स आते हैं, उन्हें दिन के दौरान वक्त मिलने पर पढ लेता हूँ. यह काम करने के लिए मैं मुंबई से एयरटेल का एक राउटर और एक अन्य सिमकार्ड लेकर आया हूँ. वैसे यूट्यूब बनाने का अभी वक्त नहीं मिल रहा है. लेकिन मौका मिलने पर फोटो और वीडियो फूटेज जमा करता जा रहा हूं. सभी से बातचीत भी करता हूँ लेकिन अभी तक किसी से बातचीत रेकॉर्ड नहीं की है. कर लेंगे.
राज्य के डीजीपी ने तो हजारों पुलिस अधिकारियों-कर्मचारियों का तंत्र संभाला होगा. मेरी वन पेन आर्मी का नन्हा सा तंत्र कैसे चलता है, यह जानकर उन्हें आनंद आया.

रात को भोजन में आधा सेब. दोपहर को लंच में आधा अमरूद खाया था. सर्दी इत्यादि की तकलीफ असल में शरीर डिटॉक्स हो रहा है, इसका संकेत है.
सर्दी-खांसी-हल्का बुखार तो सचमुच में मेरे लिए आशीर्वाद स्वरूप है. डॉक्टर आराम करने को कहते हैं और मुझे लेख लिखने का समय मिल जाता है.
मैं यहां जिस दिन आया था उस दिन मेरा शुगर, स्वामीजी ने बापू की कथा में मेरे बारे में कहा तब उन्होंने वह अंक भी बता दिया था (जो `आस्था’ टीवी द्वारा दुनिया के १७० देशों में पहुंच गया!) ३२१ (भोजन के बाद और २३१ (फास्टिंग) था. अब फास्टिंग ११४ और भोजन के बाद १३९ है. ब्लडप्रेशर १४०/९८ से अब १२२/८३ हो गया है. वजन ७९ कि.ग्रा. से ७३ कि.ग्रा. हो गया है. पल्स भी रेगुलर हो गई है.
इसके बावजूद मैं यहां के लैब में ब्लड टेस्ट करवाकर हिमोग्लोबिन, थायरॉयड, लिपिड प्रोफाइल, किडनी इत्यादि के अन्य दो-तीन टेस्टों के परिणाम मंगा लूंगा. गाडी पचास दिन के लिए गैरेज में दी है तो छोटा-बडा कोई मरम्मत का काम हो तो हो जाएगा. जहां जरूरत नहीं है वहां पर भविष्य में क्या सावधानी रखनी है, उस संबंध में सलाह मिल जाएगी. और साथ ही साथ छोटे-बड़े गड्ढों का टिनवर्क हो जाएगा तो नए पेण्ट के साथ ही वापस लौटेंगे.
डॉ. अनुराग ने एक अप्रैल को जो आधा-पौना दर्जन आयुर्वेदिक दवाएं लिख कर दी थीं वे तो कब की खरीद ली हैं लेकिन अभी तक एक भी गोली नहीं ली है. स्वामी रामदेव कहते हैं कि शरीर की विशुद्धि हो जाने के बाद ही आयुर्वेदिक दवाएं जिनके लिए जरूरी हो, उन्हें लेनी चाहिए. छह दशक के अनियंत्रित और अमर्यादित आहार-विहार के बाद शरीर स्वस्थ है, यही भगावान की बड़ी कृपा है और जो कोई छोटी मोटी तकलीफें घुस भी गईं हैं वे योगग्राम में आने के एकाध सप्ताह में ही भागने की तैयारियां कर रही हैं, यह स्वामीजी और आचार्य बालकृष्णजी की कृपा है. उन्होंने इंटीग्रेटेड पथी के नामकरण के साथ योग-प्राणायाम के साथ ही आयुर्वेद, निसर्गोपचार, एक्युप्रेशर-एक्युपंक्चर इत्यादि उपचार पद्धतियों को एक साथ समन्वित करके एलोपथी वालों को मान्य कसौटियों द्वारा सभी रोगों को समूल नष्ट करने का अभियान चलाया है.
स्वामीजी ने एक दो दिन पहले योगाभ्यास के दौरान आसन करवाते हुए कहा था कि अभी तक इन सभी के अलग अलग मोहल्ले थे-योगवालों का मुहल्ला, प्राणायामवालों का अलग मुहल्ला, आयुर्वेदवालों का, प्राकृतिक उपचारवालों का, एक्युप्रेशर-पंक्चरवालों का-सभी के अलग अलग मुहल्ले हुआ करते थे. कोई भी एक-दूसरे के मोहल्ले में प्रवेश भी नहीं करता था. योगग्राम में हम उन सभी को एक ही गांव में ले आए हैं! सभी साथ मिलकर आपकी उपचार पद्धति तय करते हैं!
इतना ही नहीं स्वामी रामदेव ने तो अलोपथी की इमरजेंसी चिकित्सा को भी स्वीकार किया ही है. कामचलाऊ इलाज के रूप में, गंभीर दुर्घटना इत्यादि के मामलों में अलोपथी की शरण में जाना ही पडता है, ऐसा वे कहते हैं. लेकिन अलोपथी किसी भी रोग का स्थायी उपचार नही है, ऐसा वे बार बार हमारे मस्तिष्क में बिठाने का प्रयास करते हैं और डॉ. मनु कोठारी के कारण इस सत्य को काफी साल पहले ही मैने स्वीकार लिया है.
निदान के लिए भी स्वामीजी आधुनिक मेडिकल सायंस का उपयोग करते हैं. आयुर्वेद में नाडी चिकित्सा एक बहुत बड़ा शास्त्र है. नाडी पर से रोग परखनेवाले नाडीवैद्य आजकर बहुत कम देखने को मिलते हैं. लेकिन यह पारंपरिक शास्त्र प्रभावी है. स्वामी रामदेव ने ब्लड टेस्ट इत्यादि द्वारा रोग को परख कर अपने देश की चिकित्सा पद्धति अपनाई है. वे जो आयुर्वेदिक दवाएं बनाते हैं, उसके लैब रिजल्ट्स और रिसर्च पेपर्स पाश्चात्य मेडिकल साइंस वालों को गले उतरे, ऐसे मेडिकल जर्नल्स में छपवाते हैं. विरोधियों की बोलती बंद करने का यह भी एक उत्तम उपाय है. उनकी सरहद में घुसकर उनके ही घर में उन्हें चुनौती दो. मोदी भी एक कुशल कूटनीतिक के रूप में बार-बार ऐसा कर चुके हैं.
ऐसा करनेवालों को कभी कभी दोनों तरफ से आघात सहने पडते हैं तो कोई बात नहीं. हमें अपना काम करते रहना है. लोग तो आपमें कोई दोष न हो तो भी छिद्रान्वेषण करते ही हैं. बाप गधे पर बैठा हो तो कहेंगे कि बाप को बेटे की नहीं पडी है. बेटा बैठा होगा तो कहेंगे ये कैसे बेटा है, बाप को पैदल चला रहा है. दोनों गधे पर बैठकर यात्रा करेंगे तो कहेंगे कि ये दोनों गूंगे प्राणी पर तनिक भी दया नहीं दिखा रहे. गधे के पैर रस्सी से बांधकर बीच में लकडी डालकर बाप-बेटा उसे कंधे पर उठाकर चलें तो कहेंगे कि कैसे मूर्ख बाप-बेटे हैं, गधा होने के बाद भी उस बैठकर यात्रा करने के बजाय उसका भार कंधे पर उठाकर चल रहे हैं.
कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना.
आप विश्वास करेंगे? आनंद बक्षी की यह अमर रचना बापू ने पांचवें दिन की कथा में स्वामीजी की उपस्थिति में गाई! आनंद बक्षी ने कल्पना तक नहीं की होगी कि उनका फिल्मी गीत व्यासपीठ पर से गाया जाएगा. नरेंद्र मोदी जब सीएम थे तब एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि उनका प्रिय हिंदी फिल्म गीत ये है:कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना.
पांचवें दिन की जो कथा सुनी, उसकी एक झलक देना काफी मजेदार होगा. कल इस बारे में लिखने का विचार किया था. लेकिन डे वन से ही स्नेही पाठक जो पूछ रहे हैं, उन्हें कल एक लंबा लेख लिखकर संतुष्ट करूंगा. योगग्राम में आने के लिए क्या करना होता है, रजिस्ट्रेशन कैसे होता है, खर्च कितना लगता है और इसके अलावा अन्य कई सारी उपयोगी टिप्स कल के महावीर जयंती तथा आंबेडकर जयंती के पावन अवसर पर दूंगा.











स्वास्थ्य लाभ के साथ लेखन के प्रति निष्ठा प्रशंसनीय है।