जेल से छूटकर राजू गाइड स्वामीजी कैसे बना

गुड मॉर्निंग- सौरभ शाह

(मुंबई समाचार, गुरुवार – ११ अक्टूबर २०१८)

जेल में राजू एक आदर्श कैदी माना जाता था. जेल जाने के बाद राजू को ध्यान में आया कि बाहर की दुनिया में लोग उसे तुनकमिजाजी और बेकार मानते थे इसका कारण यह नहीं था कि वह खुद ही वैसा था. बल्कि वह था ही गलत जगह पर. उसका कितना मान-सम्मान है, यह देखने के लिए लोगों को सेंट्रल जेल में उसे देखने आना चाहिए. उसे अनऑफिशियल वॉर्डन की जिम्मेदारी सौंपी गई थी. कैदियों की देखरेख करने के लिए वह जेल में किसी भी यार्ड में, किसी भी बैरक में घूम सकता था. कैदी उसे गुरुजी कहने लगे थे. जेल सुपरिंटेंडेंट हर सप्ताह जब हर बैरक के दौरे पर आता तब राजू को उसके पीछे चलने की जिम्मेदारी सौंपी जाती थी. जेल में वह बैंगन और गोभी ही उगाता था. पचास एकड की जेल मे जब नया नया कैदी आकर दुविधा में होता था बि राजू उसका उत्साह बढाने के लिए कहता: यहां दीवारें हैं, इस बात को भूल जाओगे तो ही खुशी से रह सकोगे.

जेल सुपरिंटेंडेंट उसे ऑफिस के फुटकर काम करने के लिए बुलाते थे. वीकेंड के अखबारों में राजू मिस नलिनी के डांस कार्यक्रमों का रिव्यू पढता था. उसके कार्यक्रम मुंबई, दिल्ली और सिलोन तक होने लगे थे. रोजी का संसार राजू की गैरमौजूदगी में सिमटने के बजाय विस्तृत होने लगा था.

जेल में उससे एक मात्र मिलने के लिए आनेवाला व्यक्ति था मणि. अन्य सभी दोस्त, रिश्तेदार जैसे राजू को भूल ही गए‍ थे. राजू को देखकर वह दुखी हो गया था. मणि को सांत्वना देने के लिए राजू ने कह:`तुम जितना सोचते हो, उतनी बुरी जगह ये नहीं है. हो सके तो तुम भी अंदर आ जाओ.’ यह बात होने के बाद मणि कभी राजू से मिलने नहीं आया. तीस मिनट की भेंट के दौरान मणि ने जो बातें कीं उससे राजू को पता चला कि नलिनी मालगुडी छोडकर चली गई है. मद्रास में रहती है. जाते समय मणि को एक हजार रूपए की बक्षीस देकर गई. उसे विदा करने के लिए स्टेशन पर हजारों की भीड जुटी थी. सैकडों बुके और फूलों के हार लेकर लोग आए थे. जाने से पहले रोजी ने पाई पाई का हिसाब चुकता कर दिया था.

दो साल की सजा काटकर राजू जब जेल से छूटा तब उसके मन में पहला विचार रोजी से मिलने का आया, दूसरा मां से मिलने का, लेकिन वह किसी तीसरी ही अनजान राह पर चल पडा. वह किसी पुराने घाव को कुरेदना नहीं चाहता था. उसे पहचानने वाले लोगों के बीच वह नहीं रहना चाहता था. दिशाहीन था. पता नहीं था कि भविष्य में कहां जाकर रहेगा, क्या काम करेगा, क्या खाएगा पिएगा. जेल से बाहर निकलकर घूमते फिरते हुए राजू दूर पहुंच जाता है. एक जर्जर मंदिर की सीढी पर सो जाता है.

उपन्यास का विलन और फिल्म का भोला राजू से बातचीत करके प्रभावित हो जाता है. भोला की पारिवारिक समस्या का निवारण हो जाता है जो डाल पर कौआ बैठते ही डाल टूट जाने जैसी घटना थी पर भोला प्रभावित हो जाता है. गांववाले प्रभावित हो गए हैं. राजू के दो वक्त के भोजन की जिम्मेदारी सभी ने ले ली है. राजू के मार्गदर्शन से मंदिर के एक हिस्से में बच्चों के पढाने की व्यवस्था हो चुकी है. तीन साल से ऐसा ही चलता रहा. हर दिन शाम को गांव के लोग राजू के पास आकर सत्संग करते हैं. बढी हुई दाढी, बढे हुए बाल के कारण लोग उसे साधु मानने लगते हैं.

इस बार बारिश लंबी खिंच गई है. फिर लगता है कि अब की बार बारिश होगी ही नहीं. खेत सूखने लगे हैं. पशु मरने लगे हैं. राजू को लोग स्वामी कहने लगे हैं. स्वामी सांत्वना देते रहते हैं कि बारिश आएगी, चिंता मत करो. लोग हतोत्साहित न हों इसीलिए राजू उन्हें बचपन में सुनी हुई कहानी सुनाता है. एक गांव में एक बार अकाल पड गया तब संत ने बारह दिन तक उपवास और तप करके मेघराज को मनाया था और बारहवें दिन के अंत में धुआंधार बरसात हुई थी. गांव अकाल से उबर गया.

गांव में खाने-पीने की किल्लत थी. अनाज का व्यापारी कालाबाजारी से ज्यादा भाव लेने लगा. एक दिन इस दुकानदार ने किसी गरीब से चावल के लिए १४ आने मांगे. गांववाला गुस्सा हो गया. उसने दुकानदार को थप्पड जड दिया. दूकानदार ने चाकू निकालकर ग्राहक पर हमला कर दिया. उस गांववाले से सहानुभूति रखनेवाले लोगों ने दुकान पर हमला करके सारा माल लूट लिया. रात को दुकानदार के रिश्तेदार और दोस्तों ने उन लोगों पर कुदाल-भाला-छूरा जो हाथ में आया वह लेकर हमला कर दिया. दो समूहों में बंटे गांववाले आपस में लडने लगे. किसी ने घास के ढेर में आग लगा दी. राजू ने दूर से आग की ज्वाला देखी. झगडे की आवाज भी सुनी. राजू ने सोचा: इन गांववालों को मुसीबत के समय में शांति से रहना भी नहीं आता. ऐसा ही चलता रहा तो मैं ये जगह छोडकर किसी दूसरे गांव चला जाऊंगा.

अगले दिन भोला का सिरफिरा छोटा भाई राजू से मिलने आया. कहने लगा: स्वामी, भैया के सिर पर चोट लगी है. आग से जल गए हैं. गांव में कई सारी महिलाएं-बच्चे घायल हो गए हैं.

राजू ने भोला के भाई के साथ विस्तार से बात करके परिस्थिति को समझा. राजू इस बीना से खूब तंग आ गया था. राजू ने उसे समझाने की कोशिश नाकाम कोशिश की, पर वह समझने को ही तैयार नहीं था. अंत में राजू ने कहा,`जाओ, जाकर भोला और अन्य लोगों से कह दो कि मैं चाहता हूं कि तुम लोग इस तरह से एक-दूसरे के साथ लडो. उन्हें क्या करना है और क्या नहीं करना है, यह बाद में बताऊंगा.’

भोला का भाई अब भी दलील करने के मूड में था. राजू ने उसे रोका और कहा: `चुप. मैं जो कहता हूं उसे ध्यान से सुनो.’

`हां, स्वामीजी’ वह थोडा सहम गया.

`जाओ, जल्दी से जाकर अपने भाई से कहों कि तुम लोग लडाई झगडा बंद नहीं करोगे तो मैं खाना छोड दूंगा.’

राजू के ये शब्द उपन्यास (और फिल्म को) को क्लाइमेक्स की ओर ले जाते हैं. अंत अब करीब है.

आज का विचार

त्याग दो दुनिया या स्वीकार लो दुनिया, जो है यही है!

क्या करना है कहो अभी के अभी, जो है यही है

किससे फटा था रिश्तों का कागज ये भूलकर

बांट लें उसके टुकडे आधे आधे, जो है वो यही है.

– भावेश भट्ट

एक मिनट!

बका इंजीनियरिंग की पढाई कर रहा था. एक दिन छत पर खडा था. तब वहां से पडोस के चाचा गुजर रहे थे.

`बका, अब आगे क्या विचार है?’

`बस, चाचाजी. टंकी भर जाए तो मोटर बंद कर दूंगा!

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