गुड मॉर्निंग- सौरभ शाह
(मुंबई समाचार, सोमवार – ४ फरवरी २०१९)
दांगट बुवा मुंबई के नंबर एक न्यूजपेपर डिस्ट्रिब्यूटर थे. दशकों पहले उनके कठिन दौर में `मुंबई समाचार’ के मालिकों ने उन्हें सहारा दिया था. `मुंबई समाचार’ के वे बहुत पुराने वितरक हैं. बुवा के पुत्र बाजीराव दांगट अब कामकाज संभालते हैं. `ठाकरे’ फिल्म में बुवा दांगट के साथ बैठे बालक बाजीराव का पात्र भी आप देख सकते हैं. `ठाकरे’ फिल्म में दिखाए अनुसार `मार्मिक’ शुरू करने के लिए दांगट बुवा ने पांच हजार की सहायता की थी. मराठी वर्जन में दो सौ रूपए ज्यादा आ गए हैं, ये दिखाकर बाल ठाकरे सौ-सौ की दो नोटें बुवा को लौटाते हुए दिखाए गए हैं. हिंदी वर्जन में सीधी सीधी बात है.
`ठाकरे’ फिल्म में जैसा कि दिखाया गया है १९६० में `मार्मिक’ शुरू करने के बाद बाला साहब ने मराठी माणूस के पक्ष में आंदोलन चलाए और १९६६ में शिवसेना की स्थापना की. १९७१ में मुंबई को शिवसेना के सबसे पहले मेयर डॉ. हेमेंद्र गुप्ते मिले. बाला साहब के पास इतनी दूरदर्शिता थी कि शिवसेना के ऐक्टिव पॉलिटिक्स में शामिल होने के बाद भी खुद केवल सेना प्रमुख का पद अपने पास रखा. शिवसेना की ट्रेड यूनियनें दत्ताजी सालवी नामक अपने वफादार साथी को सौंप दीं और मुंबई म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन का कारभार शिवसेना के नगरसेवकों और मेयर को सौंप दिया. वे खुद न तो कॉर्पोरेटर के रूप में चुनाव लडे, न मेयर का पद लेकरी शिवाजी पार्क स्थित भव्य सीफेसिंग मेयर्स बंगलो में रहने का लालच किया और भविष्य में भी मनोहर जोशी इत्यादि को मुख्यमंत्री पद सौंपा पर खुद सी.एम. नहीं बने. शिवसेना ने लोकसभा का चुनाव लडने का फैसला किया, राज्यसभा में भी अपने संसद सदस्यों को नियुक्त किया लेकिन कभी प्रधान मंत्री मनने की इच्छा नहीं रखी, न ही उसके लिए कोई होहल्ला मचाया- ममता, मायावती, लालू या अखिलेश की तरह. बाला साहब की ये नैतिक ताकत थी. आप भले ही उनकी तुलना गांधीजी या जयप्रकाश नारायण के साथ न करें लेकिन सक्रिय राजीनीति में होने के बावजूद सत्ता पद से दूर रहने के मामले में आपको उन्हीं दो महानुभावों के साथ बाला साहब को भी स्थान देना होगा.
`ठाकरे’ फिल्म की ओपनिंग आप बिलकुल मिस मत कीजिएगा. लखनऊ सेशन्स कोर्ट में बाला साहब ठाकरे पर बाबरी ध्वंस का केस है. बाला साहब मुंबई से लखनऊ एयरपोर्ट पर उतर कर कोर्ट के लिए रवाना होते हैं, ऐसा सीन है जिसके आरंभ में आपको सुखद आश्चर्य देते हुए चिरपरिचित चेहरा दिखाई देता है अंग्रेजी टीवी रिपोर्टर के रूप में. पृथ्वी थिएटर में उनके गुजराती नाटक लोगों ने खूब देखे हैं. वे हैं मनोज शाह. गुजराती समकालीन रंगभूमि पर दशकों से एकछत्र साम्राज्य स्थापित करनेवाले, `मास्टर कूलमणि’ से लेकर `मरीज’ और `हूं चंद्रकांत बक्षी’ तक के अने यादगार गुजराती नाटकों के निर्माता-निर्देशक-अभिनेता-लेखक मनोज शाह जैसे अग्रणी गुजराती मुंबईकर से `ठाकरे’ फिल्म शुरू होती है, जिसे देखकर शरीर में रोमांच पैदा होता है. होना भी चाहिए.
कोर्ट का सीन हो या जीवन के विविध पहलुओं का चित्रण हो- `ठाकरे’ फिल्म की हर फ्रेम में बाला साहब की पारदर्शी और सच्चाई भरे व्यक्तित्व की झलक आपको दिखाई देती है. कभी किसी को वे विलन लगते हैं, कभी किसी को उनकी सच्चाई में कडवाहट का स्वाद रुचिकर नहीं लगता है तो ये बालासाहब की समस्या नहीं है, फिल्म मेकर्स की भी प्रॉब्लम नहीं है. दर्शक को ये तय करना है कि वह अपने किस तराजू से इस महान व्यक्तित्व को तौलना चाहता है- मीडिया ने उनके विषय में जो छाप छोडी है उससे या मुंबई, महाराष्ट्र और भारत के मराठियों सहित सच्चे हिंदू उन्हें जिस नजरिए से देखते हैं उस तराजू से.
बाल ठाकरे जैसे व्यक्तित्व का, उनके जीवन का, उनके विचारों का सिंहावलोकन करना या विहंगावलोकन करना काफी कठिन है. आप उस बारे में पुस्तक लिखें या फिल्म लिखें- आपको उनके पारदर्शी पहलुओं में कोई अलग से रंग भरे बिना, वस्तुस्थिति को यथावत दिखाना होता है. बाला साहब दूसरों को नहीं पहचनेवाले अपने विचारों को जस्टीफाई करने में नहीं मानते थे, और उन विचारों के बारे में कभी डिफेंसिव पैंतरा भी नहीं अपनाते थे. जो है वो सामने है. अब आपका उसमें विश्वास न हो तो ये आपकी समस्या है, लेकिन पॉलिटिकली करेक्ट रहने के लिए, सभी के लिए स्वीकार्य बनने के लिए मैं आपकी मर्जी से नहीं खेलूंगा. मेरा गेम अलग है और उसके नियम भी अलग हैं. मैं आपकी गेम नहीं खेलूंगा और अगर खेलूंगा तो अपने नियमों से खेलूंगा और मेरा गेम आपको खेलना हो तो मेरे स्पष्ट नियमों से ही खेलना होगा. `ठाकरे’ फिल्म का यही संदेश है. फिल्म के अंत में आपको एक और सरप्राइज मिलता है. द एंड के बदले लिखा है: टू बी कंटीन्यूड.
आज का विचार
आज बजट के दौरान राहुल को देखकर एक विचार आया. क्या इस भाई साहब को कुछ समझ में आ भी रहा होगा?
एक मिनट!
बका: तीन तीन मैच लगातार जीतने के बाद न्यूजीलैंड के सामने भारत के ९२ रनों पर ऑल आउट हो जाने का मतलब क्या है, पका?
पका: क्या?
बका: सब कुछ ठीक चल रहा हो और कैप्टन बदल जाए तो ऐसी ही हालत होती है, कुछ समझा?









