गुड मॉर्निंग
सौरभ शाह
हिंदी फिल्में होतीं, हिंदी फिल्मों के गीत होते लेकिन इस दुनिया में किशोर कुमार की आवाज नहीं होती तो? तो पर्सनली मेरा आंतरिक विश्व जितना समृद्ध है, वह न होता, इतना वैभवशाली न होता, गरीब-रंग और बेचारा होता.
आपके लिए ये कहना बडा सरल है कि किशोर कुमार नहीं होते तो किसी दूसरे गायक की आवाज पसंद आई होती लेकिन मेरे लिए इस बात को स्वीकार करना इतना आसान नहीं है. जिस तरह से मैं अन्य माता पिता के यहां जन्मा होता है तो मेरा जीवन कैसा होता ऐसी कल्पना करना मेरे लिए असंभव है, जैसे कृष्ण मेरे ईष्टदेव न होते, ऐसी कल्पना करना असंभव है, उसी तरह से अभी याद आ रहे अनेक गीतों में किशोर कुमार के बजाय किसी अन्य गायक की आवाज होती तो ये गीत कैसे लगते, इस की कल्पना करना भी संभव नहीं है, और जरूरी भी नहीं है, और मैं दोस्ताना अंदाज में कहूँ तो ऐसी कल्पना करना भी बेहूदगी है.
`कोरा कागज था ये मन मेरा’ कोई दूसरा गायक गा ही कैसे सकता है? और गीत के बोल शुरू होने से पहले पहाडों से टकरा कर लौटती २३ सेकंड तक सुनाई देने वाली `हे हे…हे’..हे….आहा…आहा…आहा….’ गाना किसी के बस की बात नहीं है. उसी अलबम में हश-हश आवाज में गाया गया `रूप तेरा मस्ताना’ किशोर कुमार के अलावा और कौन गा सकता है? और अफकोर्स, एपरेंटली टपोरी टाइप का गीत भी किशोर दा ने कितनी शालीन- सुशील- संभ्रांत अंदाज़ में गाया है: बीती जाए जिंदगानी कब आएगी तू… गीत पनघट पे किस दिन गाएगी तू… फूल सी खिल के, पास आ दिल के, दूर से मिल के, चैन ना आए इत्यादि.
अभी दो दिन पहले ही (३१ जुलाई) मोहम्मद रफी की पुण्यतिथि थी और दो दिन बाद (४ अगस्त) किशोर कुमार की जयंती है. हिंदी फिल्म संगीत के प्रेमी आपस में झगडते रहते हैं कि कौन महान गायक है? रफी या किशोर? मेरा मानना है कि ऐसी तुलना कभी नहीं हो सकती. ऐसा झगडा तो जुनूनी लोग ही कर सकते हैं. बाकी हम कौन हैं तय करनेवाले कि दोनों में से महान गायक कौन है, बडा गायक कौन है. जिन्हें रफी पसंद हैं उन्हें रफी ही अच्छे लगेंगे. जिन्हें किशोर पसंद हैं उन्हें किशोर ही पसंद आएंगे.
एक किस्सा काफी लोकप्रिय है. उस जमाने में टाइम्स ग्रुप की एक हिंदी फिल्म मैगजीन आती थी `माधुरी’ जिसके संपादक विनोद तिवारी हुआ करते थे. फिल्मी मैगजीन में भी वे संपादकीय लिखते थे और पत्र के रूप में प्रकाशित होनेवाले उस संपादकीय के अंत में मोटे अक्षरों में लिखा जाता था: शेष फिर. एक तरह से यह उनकी कॉलम का नाम था. `माधुरी’ में एक बार चर्चा चली. पन्ने भर भर कर पाठकों के पत्र छपते थे. कई लोग रफी का पक्ष लेते, तो कई किशोर का. उग्र चर्चा चरम पर पहुंच गई. ऐसा लगा मानो रफी के प्रशंसकों और किशोर के प्रशंसकों के बीच घमासान लडाई शुरू हो जाएगी, ऐसी परिस्थिति खडी हो गई. महीनों की चर्चा के बाद संपादक ने एक लंबा पत्र छापा जिसमें लिखा था कि ये सारी चर्चा ही बेकार है. रफी ने ये ये गीत गाए हैं, जिन्हें गाने की कोई ताकत किशोर में नहीं है. दोनों में से महान गायक कौन है, इस तरह की तुलना हो ही नहीं सकती. मोहम्मद रफी ही महान हैं. किशोर कुमार की कोई बिसान नहीं है रफी के सामने.
इस लंबे पत्र के लेखक थे किशोर कुमार. और इस पत्र को छापने के बाद संपादक ने चर्चा को समेट लिया.
उम्र में मोहम्मद रफी पांच साल बडे थे. रफी का जन्म १९२४ में, किशोर का जन्म १९२९ में हुआ था. खुद से सीनियर कलाकारों का आदर कैसे करना चाहिए, यह बात किशोर कुमार से सीखने जैसी है. लता मंगेशकर तो किशोर दा से डेढ-दो महीना छोटी थीं. लताजी का जन्म २८ सितंबर १९२९ को हुआ था, बावजूद इसके किशोर खुद को उनसे जूनियर मानते हों उस अंदाज में उन्हें लता दीदी, लता दीदी कहा करते थे.
किशोर कुमार की एक्सेंट्रिसिटीज (मस्तमौला मिजाज) के बारे में कई बातें चर्चा में रहीं. उसमें से कितनी सच थीं और कितनी मनोरंजन के हिसाब से पैदा की गई थीं, यह तो भगवान जाने. कल्याणजी भाई जब मूड में होते हैं तब (वे हमेशा मूड में रहते हैं) किशोर कुमार के धुनी स्वभाव के बारे में कहते थे `खइ के पान बनारसवाला’ गीत की रेकॉर्डिंग के समय किशोरदा ने जब तक मुँह में पान रखकर गाने का मौका नहीं मिला जब तक रेकॉर्डिंग रोक रखी थी. या फिर `पीछे पड गया इनकम टैक्सम’ वाले गीत में साधु के कपडे पहनकर चारपाई पर बैठ कर ही गीत गाने की जिद की थी. ऐसी बातें चौंकानेवाली लगती हैं. काल्पनिक ही होंगी इसके बावजूद व्यक्ति की पर्सनैलिटी में उसके कारण जुडने वाले रंगों को देखकर ऐसा मानने का मन करता है कि ये सब सच ही होगा.
और शायद सच भी होगा! गुलजार ने किशोर कुमार के दो एक किस्से बताए हैं. एक दो `दो दुनी चार’ के समय का है. गुलजार उस समय फिल्म के चीफ असिस्टेंट डायरेक्टर थे. आर्टिस्ट को उसके डायलॉग्स देकर सीन समझाना, सिचुएशन समझाना उनकी जिम्मेदारी हुआ करती थी. किशोर कुमार तब गुलजार को सीरियस होकर कहते थे: `तू क्या समझा रहा है, मुझे समझ में नहीं आ रहा. जरा ऐक्टिंग करके दिखा.’
गुलजार कहते हैं: किशोर कुमार अपने जैसी कॉमेडी करने के लिए मुझसे कहते थे! यह कैसे संभव है. लेकिन इस तरह से मेरी खिंचाई करने का यह उनका तरीका था!
किसी अन्य फिल्म का एक किस्सा गुलजार याद करते हैं, किशोर कुमार को गाडी में बैठकर कंपाउंड से बाहर जाना था. सीन ओके होने के बाद किशोर कुमार को गाडी रिवर्स लेकर लौटे नहीं. कुछ घंटे बाद फोन आया कि `मैं पनवेल तक पहुंच गया हूं.’ क्योंकि डायरेक्टर को मुझसे कहना चाहिए था कि मुझे कंपाउंड छोडकर कहां तक जाना है.
किशोर कुमार के जीवन को मोटेतौर पर दो अवधियों में बांटा जा सकता है. प्री-आराधना डेज और पोस्ट आराधना डेज. किशोर कुमार का हमारे जीवन में प्रवेश हुआ `आराधना’ से. स्कूल के दिन थे. कक्षा चार-पांच. सारे लडके रेडियो सुनकर हे…हे…हा…हा…. करने लगे थे.
शेष कल.
आज का विचार
अब मित्र बनते नहीं, ऐड होते जाते हैं.
– व्हॉट्सएप पर पढा हुआ
एक मिनट!
बका: पहचाना मुझे?
अजनबी: याद नहीं आ रहा. फेसबुक पर फ्रेंड हो या फिर व्हॉट्सएप ग्रुप में साथ हैं?
बका: पांच साल से मैं आपका नेक्स्ट डोर नेबर हूं.
(मुंबई समाचार, गुरुवार – २ अगस्त २०१८)








