गुड मॉर्निंग
सौरभ शाह
जम्मू-कश्मीर मेरे लिए दशकों से अध्ययन का विषय रहा है. और इसीलिए भाजपा ने महबूबा मुफ्ती की सरकार से समर्थन वापस लिया तो मैने तुरंत ही कोई नीजर्क- जल्दबाजी में रिएक्शन देने के बदले थोडा इंतजार करना पसंद किया.
भाजपा को कश्मीर के संबंध में अवसरवादी कहकर नीचा दिखाना और महबूबा मुफ्ती की सफलताओं को गिनाना बहुत ही आसान है. बहुत ही आसान है पान की दुकान पर खडे होकर मनपसंद किमाम-सुपारी डालकर हथेली पर मावा घिसते-घिसते कश्मीर की परिस्थिति का `तटस्थ आकलन’ करना. कश्मीर में भाजपा को, सेना को और स्थानीय पुलिस को आतंकवादियों के साथ `सहृदयता’ से बर्ताव करना चाहिए जिससे कश्मीरियों की भावी पीढी के मन में भारत के प्रति `सद्भावना’ जागृत हो ऐसी होशियारी भरी सलाहें देने भी आसान है और पिछले चार दिन से मैं देख रहा हूँ कि मीडिया में इन सभी आसान-आसान बातों का प्रचार हो रहा है.
कश्मीर की वर्तमान स्थिति के बारे में विचार करते समय सबसे तो भाजपा ने सही समय पर महबूबा मुफ्ती की सरकार के पैरों तले से जमीन खींच ली, इसके लिए भाजपा की अभी तक की कश्मीर नीति के शिल्पकार और भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव राम माधव की पीठ थपथपानी चाहिए. महबूबा मुफ्ती की पीडीपी (पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी) के साथ मिलकर भाजपा कश्मीर में सरकार चलाए इसके लिए ग्राउंड वर्क भी राम माधव के नेतृत्व में तैयार किया गया था.
उचित समय पर पीडीपी के साथ हाथ मिलाकर जम्मू और कश्मीर में शासन करने का फर्स्ट हैंड अनुभव प्राप्त कर लेने के प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के विचारों को भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने राम माधव के जरिए क्रियान्वित करवाया.
तीन वर्षों के दौरान भाजपा ने जम्मू – कश्मीर के प्रशासन तंत्र में बिलकुल अंदर तक पहुँच कर देख लिया कि राज्य में कॉन्ग्रेस द्वारा पैदा किए गए दीमकों का साम्राज्य कहां तक फैला है. दूसरी ओर भाजपा ने सरकार में साझेदार होने का लाभ लेकर राज्य में अपना संगठन मजबूत बनाने का प्रयास किया.
जम्मू प्रदेश में हिंदु बहुसंख्यक होने के कारण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का फैलाव वर्षों से या यूं कहें कि दशकों से रहा है. पचास के दशक में श्यामा प्रसाद मुखर्जी की जान नेहरू सरकार ने ली, उसी जमाने से आर.एस.एस. ने जम्मू में सफलता से अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों को सफलतापूर्वक निभाया है. लेकिन कश्मीर में कॉन्ग्रेसी आशीर्वाद वाली सरकारों ने वहॉं की स्थानीय जनता के कान ऐसे भरे कि उन्होंने संघ के स्वयंसेवकों के साथ ऐसा बर्ताव किया, जैसा कि हम लोग पाकिस्तानी घुसपैठियों के साथ करते हैं.
अस्सी और नब्बे के दशकों में एक ऐसा दौर भी आया जब जम्मू-कश्मीर राज्य के तीन भाग कर देने चाहिए ऐसी मांग उठी. संघ की इस मांग के पीछे का उद्देश्य शुभ था कि राज्य के पीछे हो रहे खर्च का लाभ वहां के तीनों क्षेत्रों- जम्मू- कश्मीर वैली और लद्दाख को एक समान मिले. लड्डू का बडा भाग कश्मीर ले जाए और जम्मू तथा लद्दाख विकास से वंचित रहें, ऐसा नहीं होना चाहिए. जम्मू-कश्मीर राज्य के त्रिभाजन की इस थियरी का प्रचार करने तथा उसकी जानकारी समझाने के लिए एक समय संघ ने खूब प्रयास किए. सौभाग्य से संघ में और संघ से बाहर संघ के समर्थकों में इस विचार को बिलकुल समर्थन नहीं मिला और त्रिभाजन के फॉर्मूले को लपेट कर ताक पर रख दिया गया. अच्छा हुआ.
कश्मीर समस्या से पत्रकार-लेखक के नाते मेरा पहला परिचय १९८६-८७ के दौरान हुआ. मेरा पहला गुजराती उपन्यास `वेर वैभव’ पूरा लिख जाने के बाद मेरे मन में कश्मीर की वर्तमान समस्या के मूल में जाकर एक उपन्यास लिखने का विचार चल रहा था. लेकिन उस दौरान मैं कश्मीर का लंबा सफर करने का आयोजन नहीं कर सका और मैने बीच के समय में एक बिलकुल नए प्रकार का डिटेक्टिव फिक्शन सीरियल लिखा. तत्पश्चात १९८८ में हरकिसन मेहता ने मेरे लिए कश्मीर यात्रा की व्यवस्था की और मैं अकेले पूरे पचीस दिन लद्दाख को छोड जम्मू-कश्मीर राज्य में घूमा. छंब, बारामुला और बिलकुल उरी की सीमा तक गया. जम्मू और श्रीनगर में कई सीनियर स्कॉलर्स से मिलकर तथा वहां की युनिवर्सिटीज के इतिहास विभाग की लायब्रेरी में संग्रहित मूल दस्तावेजों का अध्ययन करके समझने का प्रयास किया कि किस कारण से अनेक कश्मीरियों को भारत अपना नहीं लगता. एक सैलानी के रूप में कश्मीर के सौंदर्य को निहारने के लिए मैं २५ दिन के रिसर्च टूर से छह घंटे अलग से निकालकर श्रीनगर से हेलिकॉप्टर द्वारा गुलमर्ग जाकर तुरंत लौट आया. पर्यटक की नजर से कश्मीर को निहारना और मैने जिस प्रकार कश्मीर को देखा उसमें अंतर होने के बावजूद उस धरती पर बिताया गया हर एक पल आपको स्वर्ग के सौंदर्य का एहसास कराता है. अनंतनाग डिस्ट्रिक्ट के एक छोटे से गांव में एक कश्मीरी पंडित के घर जाकर दो दिन रंहा (जिससे मेरी पहचना जम्मू मे हुई थी) और मुंबई से आए मेहमान को अपनी रसोई में चूल्हे के पास पालथी मारकर बॉम्बे पावभाजी भी बनाई थी.
प्रकृति की गोद में बसे उस छोटे से घर में टॉयलेट नहीं था. सुबह निपटने के लिए घर से दूर एक झरने के पास जाना होता था. पानी भरने के लिए डिब्बा या लोटा मिलेगा? ऐसा कुछ नहीं होता है यहां. डायरेक्ट झरने से अंजुली में पानी लेकर शुद्धिकरण कर लेना है!
यह दौर था १९८८ का. आतंकवाद अभी शुरू नहीं हुआ था. लेकिन चिंगारियां दिख रही थीं. लपटें उठ रही थीं. मैने १९४५ से १९४८ के कालखंड में रही इस समस्या के बीज वपन होने के दौर को केंद्र में रखकर हरकिसनभाई के लिए `जन्मोजनम’ शीर्षक से उपन्यास लिखा.
कश्मीर में किया गया यह मूलभूत संशोधन कार्य मेरे लिए १९८९ के बाद वहॉं की परिस्थिति में जो हिंसक मोड आने लगे, उसे समझने में उपयोगी बहुत ही उपयोगी रहा.
आज मोदी, राम माधव और अमित शाह के व्यावहारिक विचार के कारण कश्मीर में अच्छे दिन आ रहे हैं तो ऐसे में इस कश्मीर सिरीज में एक के बाद एक मुद्दों पर चर्चा करके हम देखेंगे कि कश्मीर की परिस्थिति अब जिस तरह से बदलती जाएगी उसका शेष भारत को कितना लाभ होगा और शेष भारत में पिछले चार साल के दौरान जिस तरह से परिस्थितियों मे सुधार हो रहा उसका लाभ कश्मीर को कितना अधिक होगा.
मित्रो, भाजपा या मोदी की यह कश्मीर नीति कोई अवसरवाद नहीं है, राष्ट्र प्रेम है. सौ प्रतिशत राष्ट्र प्रेम है. ये आदमी जब पीएम नहीं था, सीएम भी नहीं था, उस समय २५ जनवरी १९९२ को श्रीनगर के लालचौक में आतंकवादियों की संगीनों के साए में कोई पांव रखने की हिम्मत भी नहीं करता था, तब खुली छाती लेकर तिरंगा फहरा कर आया था. जिस शूर साहसी ने उस जमाने में छप्पन की छाती साबित की है उसके हाथ में अब असली मायने में संपूर्ण कश्मीर आया है. भाजपा की आलोचना करनेवाले यदि धैर्य से विचार करेंगे तो उन्हें ध्यान में आएगा कि भाजपा ने कश्मीर में महबूबा मुफ्ती का गठबंधन तोडकर कितने साहस का काम किया है, कैसी चाणक्या बुद्धि दिखाई है. देश की असली चिंता और असली देशप्रेम किसे कहा जाता है इस बात की समझ जिनके पास नहीं है ऐसे लोगों को कश्मीर की भाजपा नीति के बारे में ऊलजुलूल उतावली में कोई टिप्पणी करने के बजाय आज शुरू हो रही इस श्रृंखला का एक एक शब्द बिना किसी पूर्वाग्रह के पढकर मस्तिष्क में उतारना चाहिए.
कल से जारी.
आज का विचार
राहुल गांधी की हालत दस रूपए के सिक्के जैसी हो गई है. बंद नहीं होने के बावजूद लोग देखकर बोल देते हैं कि ये नहीं चलेगा…
– व्हॉट्सएप पर पढा हुआ.
एक मिनट!
बका: सरकार ने एक नई जनजाति रचने का निर्णय किया है.
पका: नई जनजाति? कैसी जनजाति?
बका: `झुंझलाती जनजाति’
पका: ये क्या होती है?
बका: नरेंद्रभाई के नाम से जो झुंझलाते हैं ऐसे लोगों की जनजाति.
पका: इसमें कौन कौन आते हैं?
बका: मार्क्सवादी, साम्यवादी, सेकुलरवादी, अखिलेशवादी, मायावतीवादी, ममतावादी, चंद्राबाबूवादी….







