संडे मॉर्निंग – सौरभ शाह
वाद यानी कोई विशिष्ट सिद्धांत या उस सिद्धांत के साथ जुड़े अन्य उप सिद्धांतों की श्रृंखला. अंग्रेजी में जिसे इज्म कहते हैं. मार्कसिज्म, कैपिटलिज्म या फिर सेकुलरिज्म इत्यादि. जिसे हिंदी में मार्क्सवाद, पूंजीवाद या फिर सेकुलरवाद इत्यादि कहा जाता है और उसमें मानने वालों को आप मार्क्सवादी, पूंजीवादी या सेकुलरवादी के रूप में पहचानते हैं. यह ठीक भी है.
लेकिन हिंदुत्व कोई सिद्धांत नहीं है यह जीवन शैली है. हिंदुत्व को आप किसी सिद्धांत में बांध देते हैं तो वह संकुचित हो जाता है (और हिंदुत्व विरोधी यही चाहते भी हैं). मूलभूत बात तो यह है कि हिन्दू धर्म है कोई रिलीजन नहीं. विदेशियों के पास धर्म का कोई समानार्थी शब्द है ही नहीं. ऐसी स्थितियों में हमें हिन्दू धर्म या हिंदुत्व के लिए `धर्म’ शब्द का ही उपयोग करना चाहिए था. उन लोगों के पास हमारी रोटी/ पराठा/ फुलके/ भाखरी/ थेपला इत्यादि के लिए कोई पर्यायवाची शब्द नहीं है इसलिए वे उसके लिए ब्रेड शब्द का उपयोग करते हैं. उम्दा नॉर्थ इंडियन खाना परोसने वाली फाइव स्टार रेस्टोरेंट में आप काली दाल या पनीर मखनी के साथ खाने के लिए `ब्रेड बास्केट’ मंगवाएंगे तो पाव या स्लाइस्ड ब्रेड या डिनर रोल नहीं आएगा. नान, पराठा, मिसी रोटी इत्यादि ही परोसा जाएगा, किसी जमाने में फाइव स्टार में जानेवालों में फिरंगियों की संख्या ज्यादा थी इसीलिए वे मेनू में इस प्रकार का घालमेल करते थे. हमारे तरह तरह के दहीवडे या पकौडियों या फिर पूरी दाल तडका के लिए भद्दे वर्णन करके मेनू में लिखा करते थे जो हास्यास्पद लगता था. अब भारत में फाइव स्टार्स में जानेवालों में बडे पैमाने पर भारतीय लोग ही होते हैं इसीलिए इस प्रकार के वर्णन वाले मेनू को बदल दिया जाना चाहिए. मुझे जब बुआ, मौसा, साढू या सलहज की सगाई में जो लोग मौजूद हैं उन्हें मैं पहचानता हूँ और तब कोई मुझसे कहता है कि ये तुम्हारे पिता की बहन लगती है या फिर ये तुम्हारी मां के बहनोई हैं तो मुझे अपमानजनक लगने ही वाला है. ऐसा ही कुछ हाल मेनू में लिखे भारतीय व्यंजनों के विदेशी दृष्टि से होने वाले वर्णनों के बारे में है और ऐसी ही बात मेरे धर्म को रिलिजन के स्तर पर उतारने की साजिश की है.
इसाई कोई धर्म नहीं है, रिलिजन है. यही हाल इस्लाम के साथ ही अन्य रिलिजन्स का भी है जिसमें कोई एक व्यक्ति उसकी स्थापना करता है, उनकी एक निश्चित पुस्तक होती है और बहुत सारी करणीय और अकरणीय बातें भी होती हैं. हिंदू धर्म ऐसे सभी रिलिजन्स से काफी अलग है, उदार है, व्यापक है, एक जीवनशैली है. अल्लाह को नहीं मानने वाला मुस्लिम नहीं हो सकता, जीसस क्राइस्ट में श्रद्धा नहीं रखनेवाला इसाई नहीं हो सकता लेकिन हिंदू धर्म के किसी भी भगवान, ईश्वर में, देवी देवताओं में आस्था नहीं रखनेवाला भी खुद को गर्व से हिंदू कह सकता है, क्योंकि हिंदू धर्म सीमाओं में नहीं बंधा है, इसका तानाबाना जीवनशैली के साथ बुना गया है. इस्लाम बंधनकारक है उनकी स्त्रियों के लिए. बुरखा तो पहनना ही होगा. हिंदू स्त्री जीन्स-टी शर्ट में भी मंदिर जाकर भाव से पूजा कर सकती है. इसाई समाज के बंधन उनकी बाइबल से आते हैं, उनके वेटिकन द्वारा लादे जाते हैं. हमारे यहां पर ऐसा एकछत्र साम्राज्य रखनेवाली कोई धर्मसत्ता नहीं है. मस्जिद-चर्च को कंपल्सरी डोनेशन देना पडता है जो अलग अलग नामों से जाना जाता है.मंदिर की दानपेटी में आप एक पैसा भी नहीं डालते हैं तो भी रोज दो बार आरती के साथ दर्शन कर सकते हैं, कोई दबाव नहीं होता, कोई पूछने नहीं आता, मंदिर में करोडों का दान करनेवाला जितना दर्शन का हकदार है, उतना ही अधिकार आपको भी है. चर्च में यदि आप दान धर्म करने में आनाकानी करेंगी तो आपके साथ भेदभाव की नजर से देखा जाएगा. इस्लाम में तो जकात अदा करने में आनाकानी की जाती है तो मरने के बाद भी लोग दफन होने के लिए जमीन तक नहीं देते.
हिंदू धर्म रिलिजन नहीं है और इस्लाम या इसाइयत इत्यादि रिलिजन्स धर्म की व्याख्या में नहीं बैठते हैं, इस बात को याद रखना चाहिए. वे लोग हिंदू को धर्म कहने के बजाय रिलिजन कहते हैं तो भले कहें, लेकिन हम तो हिंदुत्व को रिलिजन के बजाय केवल `धर्म’ शब्द से ही पहचानते हैं.
पांच सौ वर्ष पहले भी जब हिंदू धर्म था, रिलिजन नहीं, तब गलतफहमी होने की संभावना नहीं थी इसीलिए नरसिंह मेहता ने गाया था कि (ब्रह्म मुहूर्त में) `हमें अपने धर्म का पालन करना चाहिए…’ यहां पर धर्म यानी हमारे कर्तव्य. पांच हजार साल पहले वेदव्यास गीता में लिख गए हैं कि स्वधर्मे निधनं श्रेय:, परधर्मो भयावह:. गीताकार यहां पर धर्म को रिलिजन के संकुचित अर्थ में नहीं देखते हैं. उस समय इसाइयत का जन्म भी कहां हुआ था? इस्लाम तो बहुत दूर की बात थी. केवल डेढ या ढाई हजार साल पुराने रिलिजन गीता के रचनाकाल में थे ही नहीं. इसीलिए स्वधर्मे निधनं श्रेय: का अर्थ किसी अन्य मत में मतांतरित हो जाने के बजाय हिंदू के नाते ही मरना ऐसा तो नहीं होता? फिर इस धर्म का क्या अर्थ है? किसलिए मनुष्य को अपने धर्म का ही पालन करना चाहिए, दूसरे का नहीं. धर्म यानी करणीय विचार और आचार. शिक्षक का धर्म विद्या देना है और किसान का धर्म है फसल उगाना. भगवद् गोमंडल में `धर्म’ शब्द की व्याख्या चार-पांच पृष्ठ भर कर की गई है और धर्म के साथ जुडे शब्दों (धर्मक्षेत्र, धार्मिक, धर्मनिष्ठा इत्यादि) के लिए तकरीबन बीस एक पन्ने और दिए गए हैं. अभी हमें उसमें गहराई तक जाने की जरूरत नहीं है.
केवल इतना समझने की जरूरत है कि विदेशियों और विदेशियों के वाद में पडकर नाचने के बजाय देशी सेकुलर लोग हिंदुत्व को हिंदुइज्म के रूप में संबोधित करें तो हमें हिंदूवाद या हिंदुत्ववाद जैसी संज्ञाओं को मानने की जरूरत नहीं है. हमारे यहां पर वाद की अलग व्याख्याएं हैं. हिंदूवाद नही बल्कि `हिंदू दर्शन’ शब्द उचित है. हिंदूवादी के बजाय हमें खुद को `हिंदू दृष्टा’ कहलाने की शुरुआत करनी चाहिए. और जो अपने धर्म के लिए कट्टर, चुस्त हैं ऐसे लोगों को खुद को `कट्टर हिंदूवादी’ कहलाने के बजाय `दृढ हिंदू दृष्टा’ के रूप में पहचान बतानी चाहिए. फैनेटिज्म या कट्टरता इस्लाम में है, इसाइयत में भी है. हिंदू धर्म में कट्टरता कहां से आएगी? आब जब ईश्वर में आस्था नहीं रखने वाले व्यक्ति को भी हिंदू मानने की उदारता दिखाते हैं तो ऐसे धर्म में कट्टरता आएगी भी कहां से? दृढता जरूर होगी, कठोरता जरूर होगी. इसीलिए आज के पावन दिन पर जनऊ बदलकर कहना चाहिए कि हम `दृढ हिंदू द्रष्टा’ हैं.
आज का विचार
दुनिया के वीराने पथ पर जब जब नर ने खाई ठोकर
दो आंसू शेष बचा पाया जब जब मानव सबकुछ खोकर
मैं आया तभी द्रवित होकर मैं आया ज्ञानदीप लेकर
भूला भटका मानव पथ पर चल निकला सोते से जगकर
पथ के आवर्तों से थककर जो बैठ गया आधे पथ पर
उस नर को राह दिखाना ही मेरा सदैव का दृढ निश्चय
हिंदू तन मन
हिंदू जीवन
रग रग हिंदू मेरा परिचय.
– अटल बिहारी वाजपेयी
(मुंबई समाचार, रविवार, २६ अगस्त २०१८)








