गुड मॉर्निंग
सौरभ शाह
धारा ३७० के संदर्भ में जम्मू-कश्मीर के न्यायतंत्र का बारे में एक बात जल्दी से जान लेनी चाहिए. जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट को भारत के सुप्रीम कोर्ट जितने ही अधिकार अनेक कानूनी मामलों में दिए गए हैं. भारतीय संविधान में भारतीय नागरिकों को मिले मूलभूत अधिकारों-फंडामेंटल राइट्स से जुडे सवालों के बारे में जम्मू-कश्मीर का हाई कोर्ट कोई दखल नहीं दे सकता. ऐसे कई तकनीकी अपवादों को छोड दें तो जे एंड के हाई कोर्ट के अधिकार भारत के सुप्रीम कोर्ट के पास निहित अधिकारों जितने ही हैं. वहां के उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों तथा चीफ जस्टिस की नियुक्ति, चयन तथा उन्हें पदच्युत (इम्पीच) करने के सभी नियम वही हैं जो भारत के सुप्रीम कोर्ट के लिए बने हैं. भारत का इंडियन पीनल कोड/ आईपीसी वहां लागू नहीं होता. इसके लिए अलग से रणबीर पीनल कोड है.
सिविल तथा क्रिमिनल जैसे कई मामलों में शेष भारत के नागरिकों के लिए अनुचित और समानता के नियमों का उल्लंघन करनेवाले अनेक प्रावधान जम्मू-कश्मीर में १९५७ में लागू हुए इससे भी ९ साल पहले, १९४८ से ही इस प्रकार की सांवैधानिक शक्तियॉं प्राप्त करने के लिए गतिविधियां जम्मू-कश्मीर में शुरू हो चुकी थीं. कश्मीर द्वारा कबाइलियों के हमले से डर कर भारत के साथ विलय की संधि करने के बाद तुरंत ही राज्य में शेख अब्दुल्ला के नेतृत्ववाली `इमरजेंसी एड्मिनिस्ट्रेशन’ के रूप में सरकार की रचना हुई. शेख अब्दुल्ला ने पंडित नेहरू का प्रेम और विश्वास हासिल किया था. सैद्धांतिक रूप से नेहरू मानते थे कि दिल्ली जिस तरह से नचाएगी, उस तरह से अब्दुल्ला नाचेंगे. प्रैक्टिकली अब्दुल्ला ही अपने नृत्य का सारा प्लान तय करके दिल्ली से कहते थे कि अब इस स्क्रिप्ट के अनुसार आप काम करो और मुझे नचाने का शौक पूरा करो.
इस अंतरिम सरकार के बारे में कई प्रावधान जो भारत सरकार ने महाराजा हरिसिंह के कहने से रखे थे वे शेख अब्दुल्ला को जंचनेवाले नहीं थे. इस टेम्पररी व्यवस्था में महाराजा हरि सिंह को शायद ही कोई अच्छा अधिकार मिला हो. महाराजा ने भारत के साथ विलय के लिए जो समझौता किया था उसमें चार मुद्दे उल्लेखनीय हैं: १. भारत सरकार कश्मीर को पूर्ण सैन्य संरक्षण देने के लिए जिम्मेदार होगा. २. विदेश आने जाने के लिए जो कानून भारतीय नागरिकों पर लागू होते हैं वे ही कश्मीर के नागरिकों के लिए लागू होंगे. ३. संचार व्यवस्था के साधन जैसे कि तार, डाक, रेडियो, रेलवे, टेलीफोन, हवाई अड्डा इ. की रूपरेखा एकसमान होगी. ४. कश्मीर राज्य करकार की चुनाव व्यवस्था तथा उसका न्याय तंत्र. इस चौथे मुद्दे पर विस्तृत विचार करने का मौका हस्ताक्षर करते समय दोनों में से किसी भी पक्ष को नहीं मिला था. जम्मू-कश्मीर को अनेक विशेष सुविधाएं भारत के संविधान में दी गईं थी जिससे युवराज कर्ण सिंह खुश थे, लेकिन अन्य कई नाराज थे. यह नाराजगी १९५० में छब्बीस जनवरी को स्वतंत्र भारत का संविधान लागू होने के बाद अधिक स्पष्टता से जम्मू-कश्मीर में दिखने लगी. शेख अब्दुल्ला के शासन में रहा कश्मीर यह जान गया कि पंडित नेहरू की बांह मरोडकर जो कुछ भी चाहिए वह प्राप्त किया जा सकता है. और धारा ३७० के जरिए नेहरू ने अब्दुल्ला को जो चाहिए था वह सब दे दिया. भारतीय संविधान की अनेक धाराएँ जम्मू-कश्मीर में लागू नहीं होतीं. भारत का संविधान इस देश के सभी नागरिकों को देश के किसी भी कोने में बसने का अधिकार देता है. धारा ३७० भारतीय नागरिकों का यह अधिकार जम्मू-कश्मीर के लिए छीनते हुए कहती है कि इस राज्य में ऐसा कोई भी व्यक्ति अपना खुद का जमीन या घर नहीं ले सकता जो जम्मू-कश्मीर का मूल नागरिक नहीं है. वह व्यक्ति पक्का हिंदुस्तानी हो तो भी नहीं, उसके बाप-दादा भारत की स्वतंत्रता की जंग में या कश्मीर को कबाइलियों से बचाने की जंग में मारे गए हों तो भी नहीं.
इसके विपरीत जम्मू-कश्मीर का कोई भी नागरिक शेष भारत में किसी भी जगह जमीन-घर का स्वामित्व लेकर मजे से बस सकता है, निश्चिंत होकर अपना नौकरी-व्यवसाय कर सकता है.
आज का विचार
कदम अधूरे डालकर मंजिल तक जा चढे,
यूं चरमराएगी खाट अब तो किस तरह.
है खिन्न सूत्रधार और उंगलियां विच्छिन्न हैं,
पुतलियों की कंपकंपाहट अब किस तरह.
– मकरंद दवे
एक मिनट!
बका का बेटा: पप्पा, कल स्कूल में एक छोटा सा गेट टुगेदर है. आपको निमंत्रण है.
बका: छोटा यानी?
बका का बेटा: मैं, आप और प्रिंसिपल.











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ખુબ ખુબ ધન્યવાદ .
From MIAMI, FL, USA.