अपने देश का इतिहास कौन लिखेगा: हम या विदेशी?

संडे मॉर्निंग- सौरभ शाह

(मुंबई समाचार, रविवार – १७ फरवरी २०१९)

कंगना राणावत ने जिस बेहतरीन फिल्म `मणिकर्णिका’ में झांसी की रानी लक्ष्मीबाई को रूपहले पर्दे पर जीवंत किया है, वह भारत के ऐतिहासिक महाग्रंथ का केवल एक पृष्ठ है. १८५७ का विद्रोह बताकर बदमाश कम्युनिस्ट इतिहासकारों ने जिसे संबोधित किया वह असल में कोई छिटपुट घटना नहीं थी. देश के बहुत बडे प्रदेश में फैला और करीब डेढ साल तक चला भारत का पहला स्वतंत्रता संग्राम था. हॉलिवुड में जिस प्रकार से द्वितीय विश्व युद्ध की छोटी – बडी लडाइयों पर दर्जनों सुंदर फिल्में बनी हैं और हम तक नहीं पहुंचनेवाली अन्य करीब सौ फिल्में भी बनी हैं, ठीक उसी प्रकार से १८५७ के पहले भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के बारे में `मणिकर्णिका’ (या उससे पहले आई कोई फिल्म) के अलावा और भी दर्जनों फिल्में अब भी बन सकती हैं जो एक ही थीम पर आधारित होने के बावजूद अलग अलग घटनाओं, किरदारों को सामने रख सकती हैं.

१८५७ का वर्ष भारत के इतिहास के लिए काफी महत्वपूर्ण वर्ष है. उस समय ब्रिटिश सरकार ने अभी तक भारत पर राज करना शुरू नहीं किया था, लेकिन ब्रिटेन की ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत में व्यापार करने के बहाने पांव फैलाकर अपनी निजी सेना के बल पर भारतियों पर हुकूम चलाना शुरू कर दिया था. भारत का जो इतिहास हमें दशकों से स्कूल-कॉलेजों में पढाया जाता है, हमारे पहले प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू के कार्यकाल के दौरान लिखा गया है. उस समय शिक्षा जगत में रूस तथा चीन के प्रति वैचारिक निष्ठा रखनेवालों का बोलबाला हुआ करता था. खुद पंडित नेहरू को भी भारत द्वारा नॉन-अलाइनमेंट पॉलिसी अपनाए जाने के बावजूद, रूस (तथा चीन) के प्रति उदार भाव था. हिंदी-रूसी भाई भाई के साथ हिंदी-चीनी भाई भाई के नारे उस जमाने में बहुत कॉमन थे. भारतीय परंपरा, भारतीय धर्म, भारतीय संस्कार तथा भारतीय इतिहास को देखने का इन साम्यवादी या कम्युनिस्ट मिजाज रखनेवाले शिक्षाविदों-इतिहासकारों का नजरिया काफी अलग था. भारतीय जनता अपने प्रति स्वाभिमान का भाव न रखे और अपने देश को हीन नजरों से देखे, इस प्रकार की वक्र दृष्टि से उन्होंने इतिहास लिखा. आजादी से पहले अंग्रेज इतिहासकारों ने भी भारत के लिए यही काम किया था लेकिन वे तो अंग्रेज थे, उनका ऐसा करना कोई नई बात नहीं थी. १९४७ में आजादी मिलने के बाद भारत का इतिहास भारत के नजरिए से लिखा जाना चाहिए था. हर देश में यही परंपरा है.

जापानियों ने अमेरिका के सैनिक ठिकाने पर्ल हार्बर पर हमला किया था (जिस घटना पर हॉलिवुड में `टोरा टोरा टोरा’ नामक फिल्म बनी है) और अमेरिका को बहुत बडी हानि पहुंचाई थी. अमेरिकन युनिवर्सिटियों में क्या जापानियों द्वारा बहादुरी से की गई हाराकिरी (आत्मघाती हमले, फिदायिन हमले) का गुणगान करनेवाला इतिहास पढाया जाता है? नहीं. ये इतिहास जापान अपने विद्यार्थियों को पढाएगा. पर्ल हार्बर के हमले का मुंहतोड जवाब देने के लिए अमेरिका ने बिलकुल नीच हरकत करते हुए जापान के दो शहरों- हिरोशिमा और नागासाकी- पर एटम बम से हमला किया. परमाणु बम की इस कार्पेट बॉम्बिंग के कारण इन दोनों महानगरों के आसपास के कुल ६७ नगर-जनपद बर्बाद हो गए और दो लाख से अधिक जापानी बेवजह मौत के मुँह में समा गए. (हमें तो अमेरिका – ब्रिटेन के दुश्मन जर्मनी के तानाशाह द्वारा किए गए नरसंहार की बातें ही पढाई गई हैं, अमेरिका उससे भी कई गुना हत्याएं कर चुका है, इस बारे में कोई जानकारी ही नहीं है. वियतनाम और ईराक, अफगानिस्तान तथा सीरिया और क्युबा, अफ्रीकी देशों में अमेरिका ने प्रत्यक्ष या प्रॉक्सी वॉर से जो हत्याकांड किए हैं, उसके आंकडे हिटलर के कुकर्मों से भी कई गुना अधिक हो जाएंगे. यही हाल रूस का भी है. बहरहाल, ये विषय ही अलग है).

हिरोशिमा-नागासाकी पर एटम बम से हमला करके तबाही मचानेवाले अमेरिकी अपने देश की युनिवर्सिटी के विद्यार्थियों को अपने राक्षसी कांडों के नजरिए से उन घटनाओं को पढाते हैं क्या? नहीं. वे गर्व का अनुभव करते हैं कि हमने ऐसी बहादुरी न दिखाई होती तो दूसरे विश्व युद्ध का अंत न हुआ होता.

अमेरिकी जिसे अपनी बहादुरी मानते हैं, उसे जापानी अमेरिका की राक्षसी प्रवृत्तिवाली कायरता बताते हैं. अमेरिकियों की नीच हरकत की प्रशंसा करनेवाला इतिहास क्या जापान की युनिवर्सिटियां पढाती हैं? नहीं. जापान भी अपने नजरिए से लिखा गया इतिहास अपने विद्यार्थियों को पढाता है.

हर देश की जनता को उस देश के नजरिए से लिखा गया इतिहास पढाया जाना चाहिए. १९४७ तक ये काम नहीं हुआ लेकिन बाद के ७० साल में भी ये काम नहीं हुआ है. अब होगा. लेकिन यह काम सरकारी स्तर पर होगा, इस बात का इंतजार करते हुए बैठे रहने की जरूरत नहीं है. हमें अपनी सोच बदलनी चाहिए. हमें अपने देश को अपनी दृष्टि से देखना चाहिए, विदेशियों की दृष्टि से या विदेशियों के प्रति वफादारी रखनेवालों के नजरिए से नहीं. खाडी देशों के बारे में, गल्फ कंट्रीज को लेकर बात करते हुए हम आज भी उन देशों को `मिडल ईस्ट’ कंट्रीज कहते हैं. विश्व के नक्शे में आप देखें तो पता चलेगा कि ये देश भारत के पश्चिम में हैं. दूर पश्चिम में यूरोप-अमेरिका हैं और बीच में गल्फ कंट्रीज हैं, इसीलिए इन्हें हमारे लिए `मिड वेस्ट’ कंट्रीज कहना ही अधिक उचित है, लेकिन अमेरिका-ब्रिटेन के लिए अपने यहां से सुदूर पूर्व में बसा जापान फार ईस्ट माना जाता है, भारत ईस्टर्न (पूर्वी) देश है इसीलिए खाडी देशों को वे `मिडल ईस्ट’ कहते हैं, जो कि स्वाभाविक है, लेकिन हमें उनकी नकल करते हुए कुवैत, दुबई, मस्कत, यूएई इत्यादि को `मिडल ईस्ट’ कंट्रीज भला क्यों कहना चाहिए?

मानसिकता बदलनी होगी. वह तब बदलेगी जब हमें अपनी सच्ची पहचान मिलेगी. सच्ची पहचान तब मिलेगी जब हम अपना सच्चा इतिहास जानेंगे. सच्चा इतिहास जानने पर ही हम १८५७ के स्वतंत्रता संग्राम को `सैनिक विद्रोह’ कहना बंद करेंगे. ऐसा कहना बंद करने के लिए हमें १८५७ की उन घटनाओं की गहराई में जाना होगा. अगले रविवार से.

आज की बात

इतिहास मेरे बारे में अच्छा ही बोलेगा, क्योंकि मैं ही उसे लिखनेवाला हूँ.

-विंस्टन चर्चिल

संडे ह्यूमर

बका: पका, तुम्हें पता है कि गूगल मैप्स की सबसे बडी नाकामी क्या है?

पका: क्या है?

बका: गुलजार साहब पत्थर की हवेली से, शीशे के घरौंदों में, तिनकों के नशेमन तक, किस मोड से आते हैं और किस मोड से जाते हैं, इसे अभी तक गूगल ट्रेस ही नहीं कर सका है!

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