संडे मॉर्निंग- सौरभ शाह
(मुंबई समाचार, रविवार – ९ दिसंबर २०१८)
`गाइड‘ के गीत शीर्षक से लिखे इस श्रृंखला के सबसे पहले लेख में भूल हुई थी जो अब इस अंतिम लेख में सुधार लेते हैं. `मासे छल किए जा’ और `पिया तोसे नैना लागे’ गीतों का उल्लेख करते समय एक गीत का विवरण दूसरे गीत में चला गया था. संगीतकार उत्तम सिंह ने कहा है कि `पिया तोसे नैना लागे रे’ रूपक सात मात्राओं में कम्पोज़ किया गया है. और अभी तक नृत्य गीत को रूपक सात मात्रा में कम्पोज करने का साहस किसी भी संगीतकार ने नहीं किया है. ये गीत न भूतो, न भविष्यति जैसा है. (मैने भूल से `मोसे छल किए जा’ के लिए यह जानकारी लिखी थी. क्षमा कीजिएगा.) और संतूरवादक पंडित शिवकुमार शर्मा ने `पिया तोसे नैना लागे’ के लिए तबला बजाया था (मोसे छल किए जा’ के लिए नहीं. उसमें मारूति कीर ने तबलावादन किया है). इन दोनों गलतियों के लिए क्षमा कीजिएगा और सुधार कर पढिएगा ताकि भविष्य में मेरा यह लेख कोई संदर्भ रूप में प्रस्तुत करे तो सही जानकारी ही दे, गलत नहीं.
अब आगे बढते हैं.
अच्छे इरादे से किए गए गलत कामों का अंजाम भी गलत ही होता है, यह साबित हो गया. राजू के दो वर्ष की जेल काटकर बाहर निकलने तक इंतजार करने के लिए रोजी तो तैयार थी. ऐसा फिल्म में है. मूल उपन्यास में तो ऐसा है कि राजू जेल में मद्रास का `हिंदू’ दैनिक पढता था जिसमें वीकेंड के परिशिष्ट में रोजी के जगह जगह पर हुए कार्यक्रमों की तस्वीर छपा करती थी. राजू ने स्वीकार कर लिया था कि रोजी अब संभल चुकी होगी, और उसे मेरा कोई काम नहीं है. उपन्यास में राजू को जेल हो जाने के बाद रोजी (या राजू की मां) राजू से नहीं मिले. राजू के स्वामी बन जाने के बाद भी नहीं मिले. मां और रोजी के पात्रों का काम जेल जाने से पहले ही खत्म हो जाता है. मेरे हिसाब से यही ठीक है. लेकिन फिल्म की बात अलग है. मां और रोजी राजू के स्वामी के अवतार के बाद यदि नहीं आते तो एक दर्शक के रूप में मन को कुछ अधूरा अधूरा सा लगता. `गाइड’ के उपन्यासकार आर.के. नारायण को फिल्म का अंत भले अच्छा न लगा हो, लेकिन फिल्म में जो हुआ, वह बदलाव जरूरी था.
फिल्म के आरंभ में जिस तरह से एस.डी. बर्मन की आवाज में गीत है (`वहां कौन है तेरा’ के बारे में एक पूरा अलग लेख इसी कॉलम में लिखा जा चुका है) उसी तरह से फिल्म के अंत में जो दो गीत हैं उनमें से एक गीत में एस.डी. बर्मन की ही आवाज है.
अकाल के दिनों में स्वामी (राजू) के गले पड चुके उपवास में ग्रामवासी प्रार्थना करते हैं कि `अल्लाह मेघ दे, पानी दे, छाया दे, श्यामा मेघ दे, रामा मेघ दे…हाय रे विश्वास मेरा, हाय मेरी आशा…’
राजू से उपवास की भूख सहन नहीं हो रही. प्रसाद की थाली में पड़े केले-रामदाना मुट्ठी में लेता है, रख देता है. तभी गीत शुरू होता है. गीत खत्म होने के बाद राजू की मां भीड को चीरते हुए उसका दर्शन करने आती है.
राजू के मन में मंथन शुरू हो जाता है. राजू के गले पडे उपवास के बाद उसकी आत्मशुद्धि हो रही है. राजू की शारीरिक शक्ति का हनन हो रहा है लेकिन उसका मनोबल बढ़ रहा है. बिस्तर पर पड़े राजू की सेवा करते हुए मां का दृश्य आता है. `मां, सेवा तो मुझे करनी चाहिए तुम्हारी. जाओ, सो जाओ.’
फिल्म में अभी तक सस्पेंस है. क्या होगा. बारिश आएगी. राजू का अन्न ग्रहण कर सकेगा? मां आई, रोजी क्यों नहीं आई. और रोजी आती है. बैकग्राउंड में `लाख मना ले दुनिया, साथ न ये छूटेगा… आ के मेरे हाथों में हाथ न ये छूटेगा’ की प्रतिध्वनियॉं सुनाई दे रही हैं. रोजी करीब करीब राजू के गले लग जाती है, मानो उससे माफी मांग रही हो’…ओ मेरे जीवनसाथी, तेरे मेरे सपने अब एक रंग हैं…’
हमें लगता है कि हैप्पी एंडिंग का बैकग्राउंड बन रहा है. आखिर कौन नहीं चाहेगा कि बिछडे हुए राजू और रोजी फिर से एक न हों और साथ-साथ जीवन बिताएँ. खाया पिया और राज किया वाले अंत की कहानियॉं बचपन में अच्छी लगती थीं और बडे होने के बाद भी पसंद आती हैं. जानते हैं कि हर कहानी का अंत ऐसा नहीं होता. अब तो अनुभव भी होने लगा है. फिर भी मन में एक ही धागे पर टिकी हुई आशा टूटती नहीं. तब तक नहीं टूटती है जब तक दो रेशों के साथ बंधी रहती है. लेकिन जैसे ही आशा नीचे गिरती है और रेशा हवा में झूलने लगता है कि तुरंत आशा के साथ हम भी जमींदोस्त हो जाते हैं.
`गाइड’ का बहुचर्चित क्लाइमेक्स सीन अब आता है. स्वामी बन चुके राजू और राजू गाइड के बीच का यह संवाद है. दोनों ओर से तर्क हो रहे हैं. दोनों ही सच लग रहे हैं. पर्सनली मुझे यह सीन बहुत अच्छा नहीं लगता लेकिन फिर भी चलता है. फिल्म जबरदस्त है इसीलिए चलेगा. फिल्म खूब मुखर है, ओवर द टॉप जाकर संवाद लिखे गए हैं, इतना घुमाने फिराने या गीता की फिलासफी झाडने की जरूरत नहीं थी. बहुत ही संक्षेप में संवाद लिखे जा सकते थे. पूरी फिल्म में ऐसा सुंदर और सटीक काम संवाद के मामले में हुआ ही है. कितने दमदार संवाद हैं, कितना दमदार स्क्रीन प्ले हैं. १९६६ के `फिल्म फेयर’ अवॉर्ड्स में `गाइड’ को सबसे ज्यादा (७) अवॉर्ड्स मिले थे. उस जमाने बेस्ट संवाद के लिए एक पुरस्कार विजय आनंद को मिला था. बेस्ट स्टोरी के लिए आर.के. नायरायण को मिला था. शेष पांच में: बेस्ट फिल्म `गाइड’ (प्रोड्यूसर देव आनंद के लिए), बेस्ट डायरेक्टर- `गाइड’ (निर्देशक विजय आनंद के लिए), बेस्ट ऐक्टर- (हीरो देव आनंद के लिए), बेस्ट एक्ट्रेस-(हिरोइन वहीदा रहमान के लिए) और बेस्ट कलर सिनेमेटोग्राफी (कैमरामैन फली मिस्त्री के लिए).
सात – सात फिल्म फेयर अवॉर्ड्स `गाइड’ को मिले लेकिन इन फिल्मों का जो सबसे सशक्त डिपार्टमेंट है वह है म्यूजिक (और उससे जुडे गीतकार और गायक) जिसे पूरी तरह से नजरअंदाज किया गया है. उस वर्ष संगीत के लिए अवॉर्ड सचिन दा के बजाय `सूरज’ के लिए शंकर-जयकिशन को मिला. गीतकार के रूप में `गाइड’ में शैलेंद्र के लिखे गीतों की उपेक्षा करके हसरत जयपुरी को `सूरज’ के लिए लिखे गीत `बहारों फूल बरसाओ’ के लिए मिले और गायक के रूप में मोहम्मद रफी को `बहारों फूल बरसाओ’ के लिए मिला.
इसमें कोई संदेह नहीं है कि `बहारो फूल बरसाओ मेरा महबूब आया है’ अच्छा गीत है, सुपरहिट भी है और राजेंद्रकुमार पर फिल्माए जाने के बावजूद यह गीत देखना अच्छा लगता है. लेकिन कहां `कांटों से खींच के ये आंचल’, `गाता रहे मेरा दिल’, `क्या से क्या हो गया’, `पिया तोसे नैना लागे’, `मोसे छल’ और `दिन ढल जाए’ के अलावा `वहां कौन है तेरा’. अंत में `अल्लाह मेघ दे’ और मन्नाडे की आवाज में `हे राम’ की धुन…इन सभी रचनाओं के आगे `सूरज’ के जीत – संगीत-गायकी पानी भरें ऐसे हैं. लेकिन अवॉर्ड नहीं मिलने से सृजन की श्रेष्ठता साबित नहीं होती ऐसा नहीं है. बारबार यह बात साबित हो चुकी है. अभी भी हो रही है. संगीत और प्लेबैक सिंगिंग के लिए `गाइड’ का नॉमिनेशन तो था, पर गीतों के लिए यह भी नहीं था. शैलेंद्र को `सजन रे झूठ मत बोलो’ (`तीसरी कसम’) के लि नॉमिनेशन मिला था. आप ही तय कीजिए कि गाइड के किसी भी गीत के सामने `सजन रे झूठ मत बोलो, खुदा के पास जाना है, न हाथी है, न घोडा है, वहां पैदल ही जाना है’ जैसा साधारण गीत टिक सकता है? पर ठीक है. ये तो होता रहता है.
`गाइड’ की स्टोरी अमर है, अमर रहेगी. `गाइड’ सारी की सारी फिल्म- उसका निर्देशन, उसमें देव साहब, वहीदाजी, किशोर साहू का अभिनय की छाप आपके मन से कभी नहीं मिटेगी. और डायलॉग्स तो आप कभी भूल नहीं पाएंगे. सचिनदा, शैलेंद्र, मोहम्मद रफी, लताजी, किशोर कुमार के जीत मरते दम तक आप गुनगुनाने वाले हैं, अंतिम सांस तक गाते रहनेवाले है कि आज फिर जीने की तमन्ना है.
आज का विचार
घर में कोई भी काम इतना परफेक्ट नहीं करें कि पत्नी हर समय वह आपसे ही करवाए: चाणक्य का कामचोर विद्यार्थी.
– वॉट्सएप पर पढा हुआ
संडे ह्यूमर
करसन काका से किसी ने कहा कि शांताक्लोज आएगा लेकिन सारा दिसंबर इंतजार करने के बाद भी शांता क्लोज नहीं आई.










